ghazalKuch Alfaaz

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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वो तो अच्छा है ग़ज़ल तेरा सहारा है मुझे वर्ना फ़िक्रों ने तो बस घेर के मारा है मुझे जिस की तस्वीर मैं काग़ज़ पे बना भी न सका उस ने मेहँदी से हथेली पे उतारा है मुझे ग़ैर के हाथ से मरहम मुझे मंज़ूर नहीं तुम मगर ज़ख़्म भी दे दो तो गवारा है मुझे

Abrar Kashif

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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

Kumar Vishwas

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मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो आदमी ही मुझे रहने दो ख़ुदा मत समझो ये जो मैं होश में रहता नहीं तुम सेे मिल कर ये मिरा इश्क़ है तुम इस को नशा मत समझो रास आता नहीं सब को ये मोहब्बत का मरज़ मेरी बीमारी को तुम अपनी दवा मत समझो

Shakeel Azmi

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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

Bashir Badr

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चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली सह में सह में हाथों ने इक किताब फिर खोली दाएरे अँधेरों के रौशनी के पोरों ने कोट के बटन खोले टाई की गिरह खोली शीशे की सिलाई में काले भूत का चढ़ना बाम काठ का घोड़ा नीम काँच की गोली बर्फ़ में दबा मक्खन मौत रेल और रिक्शा ज़िंदगी ख़ुशी रिक्शा रेल मोटरें डोली इक किताब चाँद और पेड़ सब के काले कॉलर पर ज़ेहन टेप की गर्दिश मुँह में तोतों की बोली वो नहीं मिली हम को हुक बटन सरकती ज़ीन ज़िप के दाँत खुलते ही आँख से गिरी चोली

Bashir Badr

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इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके सुब्ह फिर हम ये कफ़न पहनाएँगे जज़्बात को पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को आब ओ ख़ाक ओ बा'द में भी लहर वो आ जाए है सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम इक सफ़र के बा'द फिर खुलते हैं आधी रात को सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे मामता का जिस्म माँगे ज़िंदगी की बात को

Bashir Badr

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उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं उन्हें कभी न बताना मैं उन की आँखों में वो लोग फूल समझ कर मुझे मसलते हैं कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से कहीं भी जाऊँ मिरे साथ साथ चलते हैं ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम यहाँ से तेरे मिरे रास्ते बदलते हैं

Bashir Badr

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सुब्ह का झरना हमेशा हँसने वाली औरतें झुट-पुटे की नद्दियाँ ख़ामोश गहरी औरतें मो'तदिल कर देती हैं ये सर्द मौसम का मिज़ाज बर्फ़ के टीलों पे चढ़ती धूप जैसी औरतें सब्ज़ नारंजी सुनहरी खट्टी मीठी लड़कियाँ भारी जिस्मों वाली टपके आम जैसी औरतें सड़कों बाज़ारों मकानों दफ़्तरों में रात दिन लाल नीली सब्ज़ नीली जलती बुझती औरतें शहर में इक बाग़ है और बाग़ में तालाब है तैरती हैं इस में सातों रंग वाली औरतें सैकड़ों ऐसी दुकानें हैं जहाँ मिल जाएँगी धात की पत्थर की शीशे की रबड़ की औरतें मुंजमिद हैं बर्फ़ में कुछ आग के पैकर अभी मक़बरों की चादरें हैं फूल जैसी औरतें उन के अंदर पक रहा है वक़्त का आतिश-फ़िशाँ जिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें आँसुओं की तरह तारे गिर रहे हैं अर्श से रो रही हैं आसमानों की अकेली औरतें ग़ौर से सूरज निकलते वक़्त देखो आसमाँ चूमती हैं किस का माथा उजली लंबी औरतें सब्ज़ सोने के पहाड़ों पर क़तार-अंदर-क़तार सर से सर जोड़े खड़ी हैं लंबी सीधी औरतें वाक़ई दोनों बहुत मज़लूम हैं नक़्क़ाद और माँ कहे जाने की हसरत में सुलगती औरतें

Bashir Badr

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