फ़र्ज़-ए-सुपुर्दगी में तक़ाज़े नहीं हुए तेरे कहाँ से हों कि हम अपने नहीं हुए कुछ क़र्ज़ अपनी ज़ात के हो भी गए वसूल जैसे तिरे सुपुर्द थे वैसे नहीं हुए अच्छा हुआ कि हम को मरज़ ला-दवा मिला अच्छा नहीं हुआ कि हम अच्छे नहीं हुए उस के बदन का मूड बड़ा ख़ुश-गवार है हम भी सफ़र में उम्र से ठहरे नहीं हुए इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए हम आ के तेरी बज़्म में बे-शक हुए ज़लील जितने गुनाहगार थे उतने नहीं हुए इस बार जंग उस से र'ऊनत की थी सो हम अपनी अना के हो गए उस के नहीं हुए
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात किस पे ख़र्ची है बता मेरी कमाई हुई रात और फिर यूँँ हुआ आँखों ने लहू बरसाया याद आई कोई बारिश में बिताई हुई रात हिज्र के बन में हिरन अपना भी मेरा ही गया उसरत-ए-रम से बहर-हाल रिहाई हुई रात तू तो इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत को लिए बैठा है तो कहाँ जाती मिरे जिस्म पे आई हुई रात दिल को चैन आया तो उठने लगा तारों का ग़ुबार सुब्ह ले निकली मिरे हाथ में आई हुई रात और फिर नींद ही आई न कोई ख़्वाब आया मैं ने चाही थी मिरे ख़्वाब में आई हुई रात
Vipul Kumar
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शहर-ए-नाज़ुक से वो बारीक सड़क जाती है मैं बस इक पाँव टिकाता हूँ तड़क जाती है और पैवस्त हुआ जाता है पत्थर में चराग़ लग के उस हाथ से लौ और भड़क जाती है मैं बुरा चोर नहीं हूँ मगर उस कूचे में दिल धड़क जाता है पा-पोश खड़क जाती है फूल ख़ुशबू से बिगड़ते हैं हमें भी ले चल और झोंके से वो दामन को झड़क जाती है ख़्वाब का रिज़्क़ हुई जाती है बेदारी की उम्र नींद क्या चीज़ है आँखों में रड़क जाती है
Vipul Kumar
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जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे फिर बदन और कहीं काम में लाना है मुझे इश्क़ पाँव से लिपटता है तो रुक जाता हूँ वर्ना तुम हो तो तुम्हें छोड़ के जाना है मुझे मेरे हाथों को ख़ुदा रक्खे तिरे जिस्म की ख़ैर मसअला ये है तुझे हाथ लगाना है मुझे दिल को धड़का सा लगा रहता है वो जान न ले और फिर जब्र तो ये है कि बताना है मुझे माँग लेता हूँ तिरे ग़म से ज़रा सरदारी एक दुनिया है जिसे दिल से उठाना है मुझे
Vipul Kumar
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