शहर-ए-नाज़ुक से वो बारीक सड़क जाती है मैं बस इक पाँव टिकाता हूँ तड़क जाती है और पैवस्त हुआ जाता है पत्थर में चराग़ लग के उस हाथ से लौ और भड़क जाती है मैं बुरा चोर नहीं हूँ मगर उस कूचे में दिल धड़क जाता है पा-पोश खड़क जाती है फूल ख़ुशबू से बिगड़ते हैं हमें भी ले चल और झोंके से वो दामन को झड़क जाती है ख़्वाब का रिज़्क़ हुई जाती है बेदारी की उम्र नींद क्या चीज़ है आँखों में रड़क जाती है
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात किस पे ख़र्ची है बता मेरी कमाई हुई रात और फिर यूँँ हुआ आँखों ने लहू बरसाया याद आई कोई बारिश में बिताई हुई रात हिज्र के बन में हिरन अपना भी मेरा ही गया उसरत-ए-रम से बहर-हाल रिहाई हुई रात तू तो इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत को लिए बैठा है तो कहाँ जाती मिरे जिस्म पे आई हुई रात दिल को चैन आया तो उठने लगा तारों का ग़ुबार सुब्ह ले निकली मिरे हाथ में आई हुई रात और फिर नींद ही आई न कोई ख़्वाब आया मैं ने चाही थी मिरे ख़्वाब में आई हुई रात
Vipul Kumar
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जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे फिर बदन और कहीं काम में लाना है मुझे इश्क़ पाँव से लिपटता है तो रुक जाता हूँ वर्ना तुम हो तो तुम्हें छोड़ के जाना है मुझे मेरे हाथों को ख़ुदा रक्खे तिरे जिस्म की ख़ैर मसअला ये है तुझे हाथ लगाना है मुझे दिल को धड़का सा लगा रहता है वो जान न ले और फिर जब्र तो ये है कि बताना है मुझे माँग लेता हूँ तिरे ग़म से ज़रा सरदारी एक दुनिया है जिसे दिल से उठाना है मुझे
Vipul Kumar
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फ़र्ज़-ए-सुपुर्दगी में तक़ाज़े नहीं हुए तेरे कहाँ से हों कि हम अपने नहीं हुए कुछ क़र्ज़ अपनी ज़ात के हो भी गए वसूल जैसे तिरे सुपुर्द थे वैसे नहीं हुए अच्छा हुआ कि हम को मरज़ ला-दवा मिला अच्छा नहीं हुआ कि हम अच्छे नहीं हुए उस के बदन का मूड बड़ा ख़ुश-गवार है हम भी सफ़र में उम्र से ठहरे नहीं हुए इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए हम आ के तेरी बज़्म में बे-शक हुए ज़लील जितने गुनाहगार थे उतने नहीं हुए इस बार जंग उस से र'ऊनत की थी सो हम अपनी अना के हो गए उस के नहीं हुए
Vipul Kumar
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