ग़ैर की बातों का आख़िर ऐतिबार आ ही गया मेरी जानिब से तेरे दिल में ग़ुबार आ ही गया जानता था खा रहा है बे-वफ़ा झूठी क़सम सादगी देखो कि फिर भी ऐतिबार आ ही गया पूछने वालों से तो मैं ने छुपाया दिल का राज़ फिर भी तेरा नाम लब पे एक बार आ ही गया तू न आया ओ वफ़ा दुश्मन तो क्या हम मर गए चंद दिन तड़पा किए आख़िर क़रार आ ही गया जी में था ऐ 'हश्र' उस से अब न बोलेंगे कभी बे-वफ़ा जब सामने आया तो प्यार आ ही गया
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो
Umair Najmi
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याद में तेरी जहाँ को भूलता जाता हूँ मैं भूलने वाले कभी तुझ को भी याद आता हूँ मैं एक धुँदला सा तसव्वुर है कि दिल भी था यहाँ अब तो सीने में फ़क़त इक टीस सी पाता हूँ मैं ओ वफ़ा-ना-आश्ना कब तक सुनूँ तेरा गिला बे-वफ़ा कहते हैं तुझ को और शरमाता हूँ मैं आरज़ूओं का शबाब और मर्ग-ए-हसरत हाए हाए जब बहार आए गुलिस्ताँ में तो मुरझाता हूँ मैं 'हश्र' मेरी शेर-गोई है फ़क़त फ़रियाद-ए-शौक़ अपना ग़म दिल की ज़बाँ में दिल को समझाता हूँ मैं
Agha Hashr Kashmiri
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तुम और फ़रेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है होता है पहरों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से बर्बाद दिल का आख़िरी सरमाया थी उमीद वो भी तो तुम ने छीन लिया मुझ ग़रीब से धुँदला चली निगाह दम-ए-वापसीं है अब आ पास आ के देख लूँ तुझ को क़रीब से
Agha Hashr Kashmiri
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