ghazalKuch Alfaaz

याद में तेरी जहाँ को भूलता जाता हूँ मैं भूलने वाले कभी तुझ को भी याद आता हूँ मैं एक धुँदला सा तसव्वुर है कि दिल भी था यहाँ अब तो सीने में फ़क़त इक टीस सी पाता हूँ मैं ओ वफ़ा-ना-आश्ना कब तक सुनूँ तेरा गिला बे-वफ़ा कहते हैं तुझ को और शरमाता हूँ मैं आरज़ूओं का शबाब और मर्ग-ए-हसरत हाए हाए जब बहार आए गुलिस्ताँ में तो मुरझाता हूँ मैं 'हश्र' मेरी शेर-गोई है फ़क़त फ़रियाद-ए-शौक़ अपना ग़म दिल की ज़बाँ में दिल को समझाता हूँ मैं

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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तुम और फ़रेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है होता है पहरों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से बर्बाद दिल का आख़िरी सरमाया थी उमीद वो भी तो तुम ने छीन लिया मुझ ग़रीब से धुँदला चली निगाह दम-ए-वापसीं है अब आ पास आ के देख लूँ तुझ को क़रीब से

Agha Hashr Kashmiri

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ग़ैर की बातों का आख़िर ऐतिबार आ ही गया मेरी जानिब से तेरे दिल में ग़ुबार आ ही गया जानता था खा रहा है बे-वफ़ा झूठी क़सम सादगी देखो कि फिर भी ऐतिबार आ ही गया पूछने वालों से तो मैं ने छुपाया दिल का राज़ फिर भी तेरा नाम लब पे एक बार आ ही गया तू न आया ओ वफ़ा दुश्मन तो क्या हम मर गए चंद दिन तड़पा किए आख़िर क़रार आ ही गया जी में था ऐ 'हश्र' उस से अब न बोलेंगे कभी बे-वफ़ा जब सामने आया तो प्यार आ ही गया

Agha Hashr Kashmiri

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