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gali gali abad thi jin se kahan gae vo log dilli ab ke aisi ujdi ghar ghar phaila sog saara saara din galiyon men phirte hain bekar raton uth uth kar rote hain is nagri ke log sahme sahme se baithe hain raagi aur fankar bhor bhae ab in galiyon men kaun sunae jog jab tak ham masruf rahe ye duniya thi sunsan din dhalte hi dhyan men aae kaise kaise log 'nasir' ham ko raat mila tha tanha aur udaas vahi purani baten us ki vahi purana rog gali gali aabaad thi jin se kahan gae wo log dilli ab ke aisi ujdi ghar ghar phaila sog sara sara din galiyon mein phirte hain bekar raaton uth uth kar rote hain is nagri ke log sahme sahme se baithe hain ragi aur fankar bhor bhae ab in galiyon mein kaun sunae jog jab tak hum masruf rahe ye duniya thi sunsan din dhalte hi dhyan mein aae kaise kaise log 'nasir' hum ko raat mila tha tanha aur udas wahi purani baaten us ki wahi purana rog

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का इरादा मैं ने किया था कि छोड़ दूँगा उसे बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ यूँँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ उन उजालों की धुन में फिरता हूँ छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ रैन अँधेरी है और किनारा दूर चाँद निकले तो पार उतर जाएँ

Nasir Kazmi

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दिल में और तो क्या रक्खा है तेरा दर्द छुपा रक्खा है इतने दुखों की तेज़ हवा में दिल का दीप जला रक्खा है धूप से चेहरों ने दुनिया में क्या अंधेर मचा रक्खा है इस नगरी के कुछ लोगों ने दुख का नाम दवा रक्खा है वादा-ए-यार की बात न छेड़ो ये धोका भी खा रक्खा है भूल भी जाओ बीती बातें इन बातों में क्या रक्खा है चुप चुप क्यूँँ रहते हो 'नासिर' ये क्या रोग लगा रक्खा है

Nasir Kazmi

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जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है

Nasir Kazmi

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निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं तू भी दिल से उतर न जाए कहीं आज देखा है तुझ को देर के ब'अद आज का दिन गुज़र न जाए कहीं न मिला कर उदास लोगों से हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं आरज़ू है कि तू यहाँ आए और फिर उम्र भर न जाए कहीं जी जलाता हूँ और सोचता हूँ राएगाँ ये हुनर न जाए कहीं आओ कुछ देर रो ही लें 'नासिर' फिर ये दरिया उतर न जाए कहीं

Nasir Kazmi

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नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ' जलाऊँ किस के लिए अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ' जलाऊँ किस के लिए

Nasir Kazmi

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