ghazalKuch Alfaaz

ग़म होते हैं जहाँ ज़ेहानत होती है दुनिया में हर शय की क़ीमत होती है अक्सर वो कहते हैं वो बस मेरे हैं अक्सर क्यूँँ कहते हैं हैरत होती है तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है अपनी महबूबा में अपनी माँ देखें बिन माँ के लड़कों की फ़ितरत होती है इक कश्ती में एक क़दम ही रखते हैं कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है न जलने पाते थे जिस के चूल्हे भी हर सवेरे सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है मैं जानता हूँ कि ख़ामुशी में ही मस्लहत है मगर यही मस्लहत मिरे दिल को खल रही है कभी तो इंसान ज़िंदगी की करेगा इज़्ज़त ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है

Javed Akhtar

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खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा ख़ुलूस तो है मगर ए'तिबार जाता रहा किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा अजब सा चैन था हम को कि जब थे हम बेचैन क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महफ़िल में मैं ये उमीद लिए बार बार जाता रहा

Javed Akhtar

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जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू भिक्षु-दानी, प्यासा पानी, दरिया सागर, जल गागर गुलशन ख़ुशबू, कोयल कूकू, मस्ती दारू, मैं और तू बाँबी नागिन, छाया आँगन, घुँघरू छन-छन, आशा मन आँखें काजल, पर्बत बादल, वो ज़ुल्फ़ें और ये बाज़ू रातें महकी, साँसें दहकी, नज़रें बहकी, रुत लहकी स्वप्न सलोना, प्रेम खिलौना, फूल बिछौना, वो पहलू तुम से दूरी, ये मजबूरी, ज़ख़्म-ए-कारी, बेदारी, तन्हा रातें, सपने क़ातें, ख़ुद से बातें, मेरी ख़ू

Javed Akhtar

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बहाना ढूँडते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का जो फ़स्ल ख़्वाब की तय्यार है तो ये जानो कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का है पाश पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का

Javed Akhtar

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दिल का हर दर्द खो गया जैसे मैं तो पत्थर का हो गया जैसे दाग़ बाक़ी नहीं कि नक़्श कहूँ कोई दीवार धो गया जैसे जागता ज़ेहन ग़म की धूप में था छाँव पाते ही सो गया जैसे देखने वाला था कल उस का तपाक फिर से वो ग़ैर हो गया जैसे कुछ बिछड़ने के भी तरीक़े हैं ख़ैर जाने दो जो गया जैसे

Javed Akhtar

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