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ghhazlon ki dhanak odh mire shoala-badan tu hai mera sukhan tu mira mauzu-e-sukhan tu kaliyon ki tarah phuut sar-e-shakh-e-tamanna khushbu ki tarah phail chaman-ta-ba-chaman tu nazil ho kabhi zehn pe ayat ki surat ayat men dhal ja kabhi jibril dahan tu ab kyuun na sajaun main tujhe diida o dil men lagta hai andhere men savere ki kiran tu pahle na koi ramz-e-sukhan thi na kinaya ab nuqta-e-takmil-e-hunar mehvar-e-fan tu ye kam to nahin tu mira meyar-e-nazar hai ai dost mire vaste kuchh aur na ban tu mumkin ho to rahne de mujhe zulmat-e-jan men dhundega kahan chandni raton ka kafan tu ghazlon ki dhanak odh mere shoala-badan tu hai mera sukhan tu mera mauzu-e-sukhan tu kaliyon ki tarah phut sar-e-shakh-e-tamanna khushbu ki tarah phail chaman-ta-ba-chaman tu nazil ho kabhi zehn pe aayat ki surat aayat mein dhal ja kabhi jibril dahan tu ab kyun na sajaun main tujhe dida o dil mein lagta hai andhere mein sawere ki kiran tu pahle na koi ramz-e-sukhan thi na kinaya ab nuqta-e-takmil-e-hunar mehwar-e-fan tu ye kam to nahin tu mera meyar-e-nazar hai ai dost mere waste kuchh aur na ban tu mumkin ho to rahne de mujhe zulmat-e-jaan mein dhundega kahan chandni raaton ka kafan tu

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

Tehzeeb Hafi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ ये दिल ये आसेब की नगरी मस्कन सोचूँ वहमों का सोच रहा हूँ इस नगरी में तू कब से मेहमान हुआ सहरा की मुँह-ज़ोर हवाएँ औरों से मंसूब हुईं मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ इतनी देर में उजड़े दिल पर कितने महशर बीत गए जितनी देर में तुझ को पा कर खोने का इम्कान हुआ कल तक जिस के गिर्द था रक़्साँ इक अम्बोह सितारों का आज उसी को तन्हा पा कर मैं तो बहुत हैरान हुआ उस के ज़ख़्म छुपा कर रखिए ख़ुद उस शख़्स की नज़रों से उस से कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बे-कार समझते थे उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ यूँँ भी कम-आमेज़ था 'मोहसिन' वो इस शहर के लोगों में लेकिन मेरे सामने आ कर और भी कुछ अंजान हुआ

Mohsin Naqvi

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अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा दिल का आलम है तेरे बा'द ख़लाओं जैसा काश दुनिया मेरे एहसास को वापस कर दे ख़ामुशी का वही अंदाज़ सदाओं जैसा पास रह कर भी हमेशा वो बहुत दूर मिला उस का अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल था ख़ुदाओं जैसा कितनी शिद्दत से बहारों को था एहसास-ए-मआ'ल फूल खिल कर भी रहा ज़र्द ख़िज़ाओं जैसा क्या क़यामत है कि दुनिया उसे सरदार कहे जिस का अंदाज़-ए-सुख़न भी हो गदाओं जैसा फिर तेरी याद के मौसम ने जगाए महशर फिर मेरे दिल में उठा शोर हवाओं जैसा बारहा ख़्वाब में पा कर मुझे प्यासा 'मोहसिन' उस की ज़ुल्फ़ों ने किया रक़्स घटाओं जैसा

Mohsin Naqvi

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हवा-ए-हिज्र में जो कुछ था अब के ख़ाक हुआ कि पैरहन तो गया था बदन भी चाक हुआ अब उस से तर्क-ए-त'अल्लुक़ करूँँ तो मर जाऊँ बदन से रूह का इस दर्जा इश्तिराक हुआ यही कि सब की कमानें हमीं पे टूटी हैं चलो हिसाब-ए-सफ़-ए-दोस्ताँ तो पाक हुआ वो बे-सबब यूँँही रूठा है लम्हा-भर के लिए ये सानेहा न सही फिर भी कर्ब-नाक हुआ उसी के क़ुर्ब ने तक़्सीम कर दिया आख़िर वो जिस का हिज्र मुझे वज्ह-ए-इंहिमाक हुआ शदीद वार न दुश्मन दिलेर था 'मोहसिन' मैं अपनी बे-ख़बरी से मगर हलाक हुआ

Mohsin Naqvi

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मैं दिल पे जब्र करूँँगा तुझे भुला दूँगा मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा ये तीरगी मिरे घर का ही क्यूँँ मुक़द्दर हो मैं तेरे शहर के सारे दिए बुझा दूँगा हवा का हाथ बटाऊँगा हर तबाही में हरे शजर से परिंदे मैं ख़ुद उड़ा दूँगा वफ़ा करूँँगा किसी सोगवार चेहरे से पुरानी क़ब्र पे कतबा नया सजा दूँगा इसी ख़याल में गुज़री है शाम-ए-दर्द अक्सर कि दर्द हद से बढ़ेगा तो मुस्कुरा दूँगा तू आसमान की सूरत है गर पड़ेगा कभी ज़मीं हूँ मैं भी मगर तुझ को आसरा दूँगा बढ़ा रही हैं मिरे दुख निशानियाँ तेरी मैं तेरे ख़त तिरी तस्वीर तक जला दूँगा बहुत दिनों से मिरा दिल उदास है 'मोहसिन' इस आइने को कोई अक्स अब नया दूँगा

Mohsin Naqvi

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नया है शहर नए आसरे तलाश करूँँ तू खो गया है कहाँ अब तुझे तलाश करूँँ जो दश्त में भी जलाते थे फ़स्ल-ए-गुल के चराग़ मैं शहर में भी वही आबले तलाश करूँँ तू अक्स है तो कभी मेरी चश्म-ए-तर में उतर तिरे लिए मैं कहाँ आइने तलाश करूँँ तुझे हवा से की आवारगी का इल्म कहाँ कभी मैं तुझ को तिरे सामने तलाश करूँँ ग़ज़ल कहूँ कभी सादास ख़त लिखूँ उस को उदास दिल के लिए मश्ग़ले तलाश करूँँ मिरे वजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा कभी मैं ख़ुद को तिरे वास्ते तलाश करूँँ मैं चुप रहूँ कभी बे-वज्ह हँस पड़ूँ 'मोहसिन' उसे गँवा के अजब हौसले तलाश करूँँ

Mohsin Naqvi

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