ग़म-ए-जिंदगी का असर रफ़्ता रफ़्ता हुई ख़्वाइशे मुक्तसर रफ़्ता रफ़्ता न ग़म हारने का न ख़ुश जीत से हूँ बना हूँ मैं पत्थर मगर रफ़्ता रफ़्ता रिहाई मिली पिंजरे से परिन्द को डगर से कटे जब शजर रफ़्ता रफ़्ता वही ग़म के क़िस्से वही बेकरारी अज़ीयत से लिपटा सफ़र रफ़्ता रफ़्ता है रोने की बातें हसे जा रहे हैं है सीखा ये हम ने हुनर रफ़्ता रफ़्ता रहे अच्छे लम्हों के क़ायम तकाज़े दुवाएं हुई बे-असर रफ़्ता रफ़्ता
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दिल को तेरी ख़्वाहिश पहली बार हुई इस सहरा में बारिश पहली बार हुई माँगने वाले हीरे मोती माँगते हैं अश्कों की फ़रमाइश पहली बार हुई डूबने वाले इक इक कर के आ जाएँ दरिया में गुंजाइश पहली बार हुई
Abrar Kashif
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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मैं परेशान वो दुखी हुई है ये मोहब्बत है तो बड़ी हुई है कुछ भी अपना नहीं है मेरे पास बद-दुआ भी किसी की दी हुई है उस ने पूछी है आख़िरी ख़्वाहिश और मोहब्बत भी मैं ने की हुई है आज ग़ुस्सा नहीं पिऊॅंगा मैं आज मैं ने शराब पी हुई है मैं तुम्हें इतनी बार चाहता हूँ जितनी औरत पे शा'इरी हुई है बच्चा गिरवा के क्या मिलेगा तुम्हें दुनिया पहले बहुत गिरी हुई है
Muzdum Khan
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गाहे गाहे बस अब यही हो क्या तुम से मिल कर बहुत ख़ुशी हो क्या मिल रही हो बड़े तपाक के साथ मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या याद हैं अब भी अपने ख़्वाब तुम्हें मुझ से मिल कर उदास भी हो क्या बस मुझे यूँँही इक ख़याल आया सोचती हो तो सोचती हो क्या अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या क्या कहा इश्क़ जावेदानी है! आख़िरी बार मिल रही हो क्या हाँ फ़ज़ा याँ की सोई सोई सी है तो बहुत तेज़ रौशनी हो क्या मेरे सब तंज़ बे-असर ही रहे तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या दिल में अब सोज़-ए-इंतिज़ार नहीं शम-ए-उम्मीद बुझ गई हो क्या इस समुंदर पे तिश्ना-काम हूँ मैं बान तुम अब भी बह रही हो क्या
Jaun Elia
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बस इक निगाह-ए-नाज़ को तरसा हुआ था मैं हालांकि शहर-शहर में फैला हुआ था मैं मुद्दत के बा'द आइना देखा तो रो पड़ा किस बेहतरीन दोस्त से रूठा हुआ था मैं पहना जो रेनकोट तो बारिश नहीं हुई लौटा जो घर तो शर्म से भीगा हुआ था मैं पहले भी दी गई थी मुझे बज़्म की दुआ पहले भी इस दुआ पे अकेला हुआ था मैं कितनी अजीब बात है ना! तू ही आ गया! तेरे ही इंतिज़ार में बैठा हुआ था मैं
Zubair Ali Tabish
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