घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर जानेगा अब भी तू न मिरा घर कहे बग़ैर कहते हैं जब रही न मुझे ताक़त-ए-सुख़न जानूँ किसी के दिल की मैं क्यूँँकर कहे बग़ैर काम उस से आ पड़ा है कि जिस का जहान में लेवे न कोई नाम सितमगर कहे बग़ैर जी में ही कुछ नहीं है हमारे वगरना हम सर जाए या रहे न रहें पर कहे बग़ैर छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़र कहे बग़ैर मक़्सद है नाज़-ओ-ग़म्ज़ा वले गुफ़्तुगू में काम चलता नहीं है दशना-ओ-ख़ंजर कहे बग़ैर हर चंद हो मुशाहिदा-ए-हक़ की गुफ़्तुगू बनती नहीं है बादा-ओ-साग़र कहे बग़ैर बहरा हूँ मैं तो चाहिए दूना हो इल्तिफ़ात सुनता नहीं हूँ बात मुकर्रर कहे बग़ैर 'ग़ालिब' न कर हुज़ूर में तू बार बार अर्ज़ ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए
Tehzeeb Hafi
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम
Mirza Ghalib
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ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं ग़ैर की बात बिगड़ जाए तो कुछ दूर नहीं वादा-ए-सैर-ए-गुलिस्ताँ है ख़ुशा ताले-ए-शौक़ मुज़्दा-ए-क़त्ल मुक़द्दर है जो मज़कूर नहीं शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं हसरत ऐ ज़ौक़-ए-ख़राबी कि वो ताक़त न रही इश्क़-ए-पुर-अरबदा की गूँ तन-ए-रंजूर नहीं मैं जो कहता हूँ कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हें किस र'ऊनत से वो कहते हैं कि हम हूर नहीं ज़ुल्म कर ज़ुल्म अगर लुत्फ़ दरेग़ आता हो तू तग़ाफ़ुल में किसी रंग से मा'ज़ूर नहीं साफ़ दुर्दी-कश-ए-पैमाना-ए-जम हैं हम लोग वाए वो बादा कि अफ़्शुर्दा-ए-अंगूर नहीं हूँ ज़ुहूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई 'ग़ालिब' मेरे दावे पे ये हुज्जत है कि मशहूर नहीं
Mirza Ghalib
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उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया मैं और जाऊँ दर से तिरे बिन सदा किए रखता फिरूँ हूँ ख़िर्क़ा ओ सज्जादा रहन-ए-मय मुद्दत हुई है दावत आब-ओ-हवा किए बे-सर्फ़ा ही गुज़रती है हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किए मक़्दूर हो तो ख़ाक से पूछूँ कि ऐ लईम तू ने वो गंज-हा-ए-गराँ-माया क्या किए किस रोज़ तोहमतें न तराशा किए अदू किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किए सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू देने लगा है बोसा बग़ैर इल्तिजा किए ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं भूले से उस ने सैकड़ों वा'दे वफ़ा किए 'ग़ालिब' तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या माना कि तुम कहा किए और वो सुना किए
Mirza Ghalib
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बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को ग़म क्या है तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश जानते हैं हम क्या है रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है सुख़न में ख़ामा-ए-ग़ालिब की आतिश-अफ़्शानी यक़ीं है हम को भी लेकिन अब उस में दम क्या है कटे तो शब कहें काटे तो साँप कहलावे कोई बताओ कि वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म क्या है लिखा करे कोई अहकाम-ए-ताला-ए-मौलूद किसे ख़बर है कि वाँ जुम्बिश-ए-क़लम क्या है न हश्र-ओ-नश्र का क़ाएल न केश ओ मिल्लत का ख़ुदा के वास्ते ऐसे की फिर क़सम क्या है वो दाद-ओ-दीद गराँ-माया शर्त है हमदम वगर्ना मेहर-ए-सुलेमान-ओ-जाम-ए-जम क्या है
Mirza Ghalib
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ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक क्या मज़ा होता अगर पत्थर में भी होता नमक गर्द-ए-राह-ए-यार है सामान-ए-नाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल वर्ना होता है जहाँ में किस क़दर पैदा नमक मुझ को अर्ज़ानी रहे तुझ को मुबारक होजियो नाला-ए-बुलबुल का दर्द और ख़ंदा-ए-गुल का नमक शोर-ए-जौलाँ था कनार-ए-बहर पर किस का कि आज गर्द-ए-साहिल है ब-ज़ख़्म-ए-मौज-ए-दरिया नमक दाद देता है मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर की वाह वाह याद करता है मुझे देखे है वो जिस जा नमक छोड़ कर जाना तन-ए-मजरूह-ए-आशिक़ हैफ़ है दिल तलब करता है ज़ख़्म और माँगे हैं आ'ज़ा नमक ग़ैर की मिन्नत न खींचूँगा पय-ए-तौफ़ीर-ए-दर्द ज़ख़्म मिस्ल-ए-ख़ंदा-ए-क़ातिल है सर-ता-पा नमक याद हैं 'ग़ालिब' तुझे वो दिन कि वज्द-ए-ज़ौक़ में ज़ख़्म से गिरता तो मैं पलकों से चुनता था नमक इस अमल में ऐश की लज़्ज़त नहीं मिलती 'असद' ज़ोर निस्बत मय से रखता है अज़ारा का नमक
Mirza Ghalib
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