ghazalKuch Alfaaz

गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी कच्चे मकाँ में अब के भी बरसात काट दी वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल अफ़्सोस ये है उस ने मिरी बात काट दी दिल भी लहू-लुहान है आँखें भी हैं उदास शायद अना ने शह-रग-ए-जज़्बात काट दी जब भी हमें चराग़ मुयस्सर न आ सका सूरज के ज़िक्र से शब-ए-ज़ुल्मात काट दी जादूगरी का खेल अधूरा ही रह गया दरवेश ने शबीह-ए-तिलिस्मात काट दी हालाँकि हम मिले थे बड़ी मुद्दतों के बा'द औक़ात की कमी ने मुलाक़ात काट दी ठंडी हवाएँ महकी फ़ज़ा नर्म चाँदनी शब तो बस एक थी जो तिरे सात काट दी

Related Ghazal

कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

88 likes

जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस

Sandeep Thakur

50 likes

कोई हसीं तो कोई दर्दनाक समझेगा मेरा मिजाज़ वही ठीक ठाक समझेगा मैं जिस के साथ कई रातों से हूँ उस का नाम बता तो दूँगा मगर तू मज़ाक़ समझेगा वो जिस हिसाब से गाता है उस से लगता है कि मेरे दुख को तो बस बी प्राक समझेगा

Kushal Dauneria

36 likes

वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ को मैं उसे ग़ैर न हो जाए वो बस इतनी हसरत है तो है जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ'' की रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है

Deepti Mishra

29 likes

तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं

Fahmi Badayuni

33 likes

More from Tahir Faraz

कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझ को पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा पलकों पे उस की जले बुझेंगे जुगनू जब मिरी यादों के कमरे में होंगी बरसातें घर जंगल हो जाएगा जिस दिन उस की ज़ुल्फ़ें उस के शानों पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद बादल हो जाएगा जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा उस की यादें उस की बातें उस की वफ़ाएँ उस का प्यार किस को ख़बर थी जीना मुश्किल एक इक पल हो जाएगा मत घबरा ऐ प्यासे दरिया सूरज आने वाला है बर्फ़ पहाड़ों से पिघली तो जल ही जल हो जाएगा

Tahir Faraz

0 likes

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी

Tahir Faraz

1 likes

अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुई तुझ से मिलने की ऐ दरिया मजबूरी भी ख़त्म हुई कैसा प्यार कहाँ की उल्फ़त इश्क़ की बात तो जाने दो मेरे लिए अब उस के दिल से हमदर्दी भी ख़त्म हुई सामने वाली बिल्डिंग में अब काम है बस आराइश का कल तक जो मिलती थी हमें वो मज़दूरी भी ख़त्म हुई जेल से वापस आ कर उस ने पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ी मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई जिस की जल-धारा से बस्ती वाले जीवन पाते थे रस्ता बदलते ही नद्दी के वो बस्ती भी ख़त्म हुई

Tahir Faraz

1 likes

में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मिरे कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मिरे सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे अपनी चाहत के शब-ओ-रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तिरे नाम किया यार मिरे तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मिरे ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ में छोड़ के तू मुझे इस वक़्त न जा यार मिरे ख़ुश-नसीबी से ये साअ'त तिरे हाथ आई है आसमाँ झुकने लगा हाथ बढ़ा यार मिरे

Tahir Faraz

0 likes

ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया जुगनू जले बुझे मिरी पलकों पे सुब्ह तक जब भी तिरा ख़याल सर-ए-शाम आ गया महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त शायद तिरे लबों पे मिरा नाम आ गया कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या बे-साख़्ता लबों पे तिरा नाम आ गया मैं ने तो एक लाश की दी थी ख़बर 'फ़राज़' उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया

Tahir Faraz

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Tahir Faraz.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Tahir Faraz's ghazal.