गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी कच्चे मकाँ में अब के भी बरसात काट दी वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल अफ़्सोस ये है उस ने मिरी बात काट दी दिल भी लहू-लुहान है आँखें भी हैं उदास शायद अना ने शह-रग-ए-जज़्बात काट दी जब भी हमें चराग़ मुयस्सर न आ सका सूरज के ज़िक्र से शब-ए-ज़ुल्मात काट दी जादूगरी का खेल अधूरा ही रह गया दरवेश ने शबीह-ए-तिलिस्मात काट दी हालाँकि हम मिले थे बड़ी मुद्दतों के बा'द औक़ात की कमी ने मुलाक़ात काट दी ठंडी हवाएँ महकी फ़ज़ा नर्म चाँदनी शब तो बस एक थी जो तिरे सात काट दी
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस
Sandeep Thakur
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कोई हसीं तो कोई दर्दनाक समझेगा मेरा मिजाज़ वही ठीक ठाक समझेगा मैं जिस के साथ कई रातों से हूँ उस का नाम बता तो दूँगा मगर तू मज़ाक़ समझेगा वो जिस हिसाब से गाता है उस से लगता है कि मेरे दुख को तो बस बी प्राक समझेगा
Kushal Dauneria
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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ को मैं उसे ग़ैर न हो जाए वो बस इतनी हसरत है तो है जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ'' की रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है
Deepti Mishra
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तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं
Fahmi Badayuni
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कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझ को पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा पलकों पे उस की जले बुझेंगे जुगनू जब मिरी यादों के कमरे में होंगी बरसातें घर जंगल हो जाएगा जिस दिन उस की ज़ुल्फ़ें उस के शानों पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद बादल हो जाएगा जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा उस की यादें उस की बातें उस की वफ़ाएँ उस का प्यार किस को ख़बर थी जीना मुश्किल एक इक पल हो जाएगा मत घबरा ऐ प्यासे दरिया सूरज आने वाला है बर्फ़ पहाड़ों से पिघली तो जल ही जल हो जाएगा
Tahir Faraz
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जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी
Tahir Faraz
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अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुई तुझ से मिलने की ऐ दरिया मजबूरी भी ख़त्म हुई कैसा प्यार कहाँ की उल्फ़त इश्क़ की बात तो जाने दो मेरे लिए अब उस के दिल से हमदर्दी भी ख़त्म हुई सामने वाली बिल्डिंग में अब काम है बस आराइश का कल तक जो मिलती थी हमें वो मज़दूरी भी ख़त्म हुई जेल से वापस आ कर उस ने पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ी मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई जिस की जल-धारा से बस्ती वाले जीवन पाते थे रस्ता बदलते ही नद्दी के वो बस्ती भी ख़त्म हुई
Tahir Faraz
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में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मिरे कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मिरे सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे अपनी चाहत के शब-ओ-रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तिरे नाम किया यार मिरे तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मिरे ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ में छोड़ के तू मुझे इस वक़्त न जा यार मिरे ख़ुश-नसीबी से ये साअ'त तिरे हाथ आई है आसमाँ झुकने लगा हाथ बढ़ा यार मिरे
Tahir Faraz
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ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया जुगनू जले बुझे मिरी पलकों पे सुब्ह तक जब भी तिरा ख़याल सर-ए-शाम आ गया महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त शायद तिरे लबों पे मिरा नाम आ गया कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या बे-साख़्ता लबों पे तिरा नाम आ गया मैं ने तो एक लाश की दी थी ख़बर 'फ़राज़' उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया
Tahir Faraz
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