haail thi biich men jo razai tamam shab is ghham se ham ko niind na aai tamam shab ki yaas se havas ne ladai tamam shab tum ne to khuub raah dikhai tamam shab phir bhi to khatm ho na saki aarzu ki baat har chand ham ne un ko sunai tamam shab bebak milte hi jo hue ham to sharm se aankh us pari ne phir na milai tamam shab dil khuub janta hai ki tum kis khayal se karte rahe adu ki burai tamam shab phir shaam hi se kyuun vo chale the chhuda ke haath dukhti rahi jo un ki kalai tamam shab 'hasrat' se kuchh vo aate hi aise hue khafa phir ho saki na un se safai tamam shab hail thi bich mein jo razai tamam shab is gham se hum ko nind na aai tamam shab ki yas se hawas ne ladai tamam shab tum ne to khub rah dikhai tamam shab phir bhi to khatm ho na saki aarzu ki baat har chand hum ne un ko sunai tamam shab bebak milte hi jo hue hum to sharm se aankh us pari ne phir na milai tamam shab dil khub jaanta hai ki tum kis khayal se karte rahe adu ki burai tamam shab phir sham hi se kyun wo chale the chhuda ke hath dukhti rahi jo un ki kalai tamam shab 'hasrat' se kuchh wo aate hi aise hue khafa phir ho saki na un se safai tamam shab
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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क्या वो अब नादिम हैं अपने जौर की रूदाद से लाए हैं मेरठ जो आख़िर मुझ को फ़ैज़ाबाद से सैर-ए-गुल को आई थी जिस दम सवारी आप की फूल उट्ठा था चमन फ़ख़्र-ए-मुबारकबाद से हर कस-ओ-ना-कस हो क्यूँँकर कामगार-ए-बे-ख़ुदी ये हुनर सीखा है दिल ने इक बड़े उस्ताद से इक जहाँ मस्त-ए-मोहब्बत है कि हर सू ब-ए-उन्स छाई है उन गेसुओं की निकहत-ए-बर्बाद से अब तलक मौजूद है कुछ कुछ लगा लाए थे हम वो जो इक लपका कभी न ख़ाक-ए-जहाँ आबाद से दावा-ए-तक़्वा का 'हसरत' किस को आता है यक़ीं आप और जाते रहें पीर-ए-मुग़ाँ की याद से
Hasrat Mohani
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आसान-ए-हक़ीकी है न कुछ सहल-ए-मजाज़ी मालूम हुई राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी कुछ लुत्फ़ ओ नज़र लाज़िम ओ मलज़ूम नहीं हैं इक ये भी तमन्ना की न हो शोबदा बाज़ी दिल ख़ूब समझता है तिरे हर्फ़-ए-करम को हर-चंद वो उर्दू है न तुर्की है न ताज़ी क़ाएम है न वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का आलम बाक़ी है न वो शौक़ की हंगामा-नवाज़ी ऐ इश्क़ तिरी फ़तह बहर-हाल है साबित मर कर भी शहीदान-ए-मोहब्बत हुए ग़ाज़ी कर जल्द हमें ख़त्म कहीं ऐ ग़म-ए-जानाँ काम आएगी किस रोज़ तिरी सीना-गुदाज़ी मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी
Hasrat Mohani
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हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे मायूस कर सका न हुजूम-ए-बला मुझे हर नग़्में ने उन्हीं की तलब का दिया पयाम हर साज़ ने उन्हीं की सुनाई सदा मुझे हर बात में उन्हीं की ख़ुशी का रहा ख़याल हर काम से ग़रज़ है उन्हीं की रज़ा मुझे रहता हूँ ग़र्क़ उन के तसव्वुर में रोज़ ओ शब मस्ती का पड़ गया है कुछ ऐसा मज़ा मुझे रखिए न मुझ पे तर्क-ए-मोहब्बत की तोहमतें जिस का ख़याल तक भी नहीं है रवा मुझे क्या कहते हो कि और लगा लो किसी से दिल तुम सा नज़र भी आए कोई दूसरा मुझे बेगाना-ए-अदब किए देती है क्या करूँं उस महव-ए-नाज़ की निगह-ए-आशना मुझे उस बे-निशां के मिलने की 'हसरत' हुई उम्मीद आब-ए-बक़ा से बढ़ के है ज़हर-ए-फ़ना मुझे
Hasrat Mohani
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और भी हो गए बेगाना वो ग़फ़लत कर के आज़माया जो उन्हें ज़ब्त-ए-मोहब्बत कर के दिल ने छोड़ा है न छोड़े तिरे मिलने का ख़याल बार-हा देख लिया हम ने मलामत कर के देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के पस्ती-ए-हौसला-ए-शौक़ की अब है ये सलाह बैठ रहिए ग़म-ए-हिज्राँ पे क़नाअ'त कर के दिल ने पाया है मोहब्बत का ये आली रुत्बा आप के दर्द-ए-दवाकार की ख़िदमत कर के रूह ने पाई है तकलीफ़-ए-जुदाई से नजात आप की याद को सरमाया-ए-राहत कर के छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि संभलों 'हसरत' सब्र ओ ताब-ए-दिल-ए-बीमार को ग़ारत कर के
Hasrat Mohani
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वो चुप हो गए मुझ से क्या कहते कहते कि दिल रह गया मुद्दआ' कहते कहते मिरा इश्क़ भी ख़ुद-ग़रज़ हो चला है तिरे हुस्न को बे-वफ़ा कहते कहते शब-ए-ग़म किस आराम से सो गए हैं फ़साना तिरी याद का कहते कहते ये क्या पड़ गई ख़ू-ए-दुश्नाम तुम को मुझे ना-सज़ा बरमला कहते कहते ख़बर उन को अब तक नहीं मर मिटे हम दिल-ए-ज़ार का माजरा कहते कहते अजब क्या जो है बद-गुमाँ सब से वाइज़ बुरा सुनते सुनते बुरा कहते कहते वो आए मगर आए किस वक़्त 'हसरत' कि हम चल बसे मरहबा कहते कहते
Hasrat Mohani
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