हमारी आँख ने देखे हैं ऐसे मंज़र भी गुलों की शाख़ से लटके हुए थे ख़ंजर भी यहाँ वहाँ के अँधेरों का क्या करें मातम कि इस से बढ़ के अँधेरे हैं दिल के अंदर भी अभी से हाथ महकने लगे हैं क्यूँँ मेरे अभी तो देखा नहीं है बदन को छू कर भी किसे तलाश करें अब नगर नगर लोगों जवाब देते नहीं हैं भरे हुए घर भी हमारी तिश्ना-लबी पर न कोई बूँद गिरी घटाएँ जा चुकीं चारों तरफ़ बरस कर भी ये ख़ून रंग-ए-चमन में बदल भी सकता है ज़रा ठहर कि बदल जाएँगे ये मंज़र भी 'अली' अभी तो बहुत सी हैं अन-कही बातें कि ना-तमाम ग़ज़ल है तमाम हो कर भी
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है कि ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है अजीब दुख है हम उस के होकर भी उस को छूने से डर रहे हैं अजीब दुख है हमारे हिस्से की आग औरों में बट रही है मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फ़ोन करता सुनो यहाँ कोई मस’अला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है मुझ ऐसे पेड़ों के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को ये बेल शायद किसी मुसीबत में है जो मुझ से लिपट रही है ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज़्दाद बेच देगी जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है सो इस तअ'ल्लुक़ में जो ग़लत-फ़हमियाँ थीं अब दूर हो रही हैं रुकी हुई गाड़ियों के चलने का वक़्त है धुँध छट रही है
Tehzeeb Hafi
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तुम जो आओगे तो मौसम दूसरा हो जाएगा लू का झोंका भी चलेगा तो सबा हो जाएगा ज़िंदगी में क़त्ल कर के तुझ को निकला था मगर क्या ख़बर थी फिर तिरा ही सामना हो जाएगा नफ़रतों ने हर तरफ़ से घेर रक्खा है हमें जब ये दीवारें गिरेंगी रास्ता हो जाएगा आँधियों का काम चलना है ग़रज़ इस से नहीं पेड़ पर पत्ता रहेगा या जुदा हो जाएगा क्या ख़बर थी ऐ अमीर-ए-शहर तेरे दौर में साँस लेना जुर्म जीना हादसा हो जाएगा आप पैदा तो करें दस्त-ए-हुनर फिर देखिए आप के हाथों में पत्थर आईना हो जाएगा मेरे होंटों पे हँसी आ कर रहेगी ऐ 'अली' एक दिन ये वाक़िआ' भी देखना हो जाएगा
Ali Ahmad Jalili
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रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है शोलों से बचा शहर तो शबनम से जला है कमरा किसी मानूस सी ख़ुशबू से बसा है जैसे कोई उठ कर अभी बिस्तर से गया है ये बात अलग है कि मैं जीता हूँ अभी तक होने को तो सौ बार मिरा क़त्ल हुआ है फूलों ने चुरा ली हैं मुझे देख के आँखें काँटों ने बड़ी दूर से पहचान लिया है उस सम्त अभी ख़ून के प्यासे हैं हज़ारों इस सम्त बस इक क़तरा-ए-ख़ूँ और बचा है रूदाद-ए-चराग़ाँ तो बहुत ख़ूब है लेकिन क्या जानिए किस किस का लहू इन में जला है इस रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल पे 'अली' छाप है मेरी ये ज़ौक़-ए-सुख़न मुझ को विरासत में मिला है
Ali Ahmad Jalili
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एक खिड़की गली की खुली रात भर मुंतज़िर जाने किस की रही रात भर हम जलाते रहे अपने दिल के दिए तीरगी क़त्ल होती रही रात भर मेरी आँखों को कर के अता रतजगे मेरी तन्हाई सोती रही रात भर एक ख़ुशबू दराज़ों से छनती हुई दस्तकें जैसे देती रही रात भर दिल के अंदर कोई जैसे चलता रहा चाप क़दमों की आती रही रात भर एक तहरीर जो उस के हाथों की थी बात वो मुझ से करती रही रात भर एक सूरत 'अली' थी जो जान-ए-ग़ज़ल मेरे शे'रों में ढलती रही रात भर
Ali Ahmad Jalili
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ख़ुशी ने मुझ को ठुकराया है दर्द-ओ-ग़म ने पाला है गुलों ने बे-रुख़ी की है तो काँटों ने सँभाला है मोहब्बत में ख़याल-ए-साहिल-ओ-मंज़िल है नादानी जो इन राहों में लुट जाए वही तक़दीर वाला है जहाँ भर को मता-ए-लाला-ओ-गुल बख़्शने वालो हमारे दिल का काँटा भी कभी तुम ने निकाला है किनारों से मुझे ऐ ना-ख़ुदाओ दूर ही रखना वहाँ ले कर चलो तूफ़ाँ जहाँ से उठने वाला है चराग़ाँ कर के दिल बहला रहे हो क्या जहाँ वालो अँधेरा लाख रौशन हो उजाला फिर उजाला है नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो ग़म क्या था यहाँ तो बेचने वालों ने गुलशन बेच डाला है
Ali Ahmad Jalili
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