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तुम जो आओगे तो मौसम दूसरा हो जाएगा लू का झोंका भी चलेगा तो सबा हो जाएगा ज़िंदगी में क़त्ल कर के तुझ को निकला था मगर क्या ख़बर थी फिर तिरा ही सामना हो जाएगा नफ़रतों ने हर तरफ़ से घेर रक्खा है हमें जब ये दीवारें गिरेंगी रास्ता हो जाएगा आँधियों का काम चलना है ग़रज़ इस से नहीं पेड़ पर पत्ता रहेगा या जुदा हो जाएगा क्या ख़बर थी ऐ अमीर-ए-शहर तेरे दौर में साँस लेना जुर्म जीना हादसा हो जाएगा आप पैदा तो करें दस्त-ए-हुनर फिर देखिए आप के हाथों में पत्थर आईना हो जाएगा मेरे होंटों पे हँसी आ कर रहेगी ऐ 'अली' एक दिन ये वाक़िआ' भी देखना हो जाएगा

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है शोलों से बचा शहर तो शबनम से जला है कमरा किसी मानूस सी ख़ुशबू से बसा है जैसे कोई उठ कर अभी बिस्तर से गया है ये बात अलग है कि मैं जीता हूँ अभी तक होने को तो सौ बार मिरा क़त्ल हुआ है फूलों ने चुरा ली हैं मुझे देख के आँखें काँटों ने बड़ी दूर से पहचान लिया है उस सम्त अभी ख़ून के प्यासे हैं हज़ारों इस सम्त बस इक क़तरा-ए-ख़ूँ और बचा है रूदाद-ए-चराग़ाँ तो बहुत ख़ूब है लेकिन क्या जानिए किस किस का लहू इन में जला है इस रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल पे 'अली' छाप है मेरी ये ज़ौक़-ए-सुख़न मुझ को विरासत में मिला है

Ali Ahmad Jalili

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हमारी आँख ने देखे हैं ऐसे मंज़र भी गुलों की शाख़ से लटके हुए थे ख़ंजर भी यहाँ वहाँ के अँधेरों का क्या करें मातम कि इस से बढ़ के अँधेरे हैं दिल के अंदर भी अभी से हाथ महकने लगे हैं क्यूँँ मेरे अभी तो देखा नहीं है बदन को छू कर भी किसे तलाश करें अब नगर नगर लोगों जवाब देते नहीं हैं भरे हुए घर भी हमारी तिश्ना-लबी पर न कोई बूँद गिरी घटाएँ जा चुकीं चारों तरफ़ बरस कर भी ये ख़ून रंग-ए-चमन में बदल भी सकता है ज़रा ठहर कि बदल जाएँगे ये मंज़र भी 'अली' अभी तो बहुत सी हैं अन-कही बातें कि ना-तमाम ग़ज़ल है तमाम हो कर भी

Ali Ahmad Jalili

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एक खिड़की गली की खुली रात भर मुंतज़िर जाने किस की रही रात भर हम जलाते रहे अपने दिल के दिए तीरगी क़त्ल होती रही रात भर मेरी आँखों को कर के अता रतजगे मेरी तन्हाई सोती रही रात भर एक ख़ुशबू दराज़ों से छनती हुई दस्तकें जैसे देती रही रात भर दिल के अंदर कोई जैसे चलता रहा चाप क़दमों की आती रही रात भर एक तहरीर जो उस के हाथों की थी बात वो मुझ से करती रही रात भर एक सूरत 'अली' थी जो जान-ए-ग़ज़ल मेरे शे'रों में ढलती रही रात भर

Ali Ahmad Jalili

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ख़ुशी ने मुझ को ठुकराया है दर्द-ओ-ग़म ने पाला है गुलों ने बे-रुख़ी की है तो काँटों ने सँभाला है मोहब्बत में ख़याल-ए-साहिल-ओ-मंज़िल है नादानी जो इन राहों में लुट जाए वही तक़दीर वाला है जहाँ भर को मता-ए-लाला-ओ-गुल बख़्शने वालो हमारे दिल का काँटा भी कभी तुम ने निकाला है किनारों से मुझे ऐ ना-ख़ुदाओ दूर ही रखना वहाँ ले कर चलो तूफ़ाँ जहाँ से उठने वाला है चराग़ाँ कर के दिल बहला रहे हो क्या जहाँ वालो अँधेरा लाख रौशन हो उजाला फिर उजाला है नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो ग़म क्या था यहाँ तो बेचने वालों ने गुलशन बेच डाला है

Ali Ahmad Jalili

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