ख़ुशी ने मुझ को ठुकराया है दर्द-ओ-ग़म ने पाला है गुलों ने बे-रुख़ी की है तो काँटों ने सँभाला है मोहब्बत में ख़याल-ए-साहिल-ओ-मंज़िल है नादानी जो इन राहों में लुट जाए वही तक़दीर वाला है जहाँ भर को मता-ए-लाला-ओ-गुल बख़्शने वालो हमारे दिल का काँटा भी कभी तुम ने निकाला है किनारों से मुझे ऐ ना-ख़ुदाओ दूर ही रखना वहाँ ले कर चलो तूफ़ाँ जहाँ से उठने वाला है चराग़ाँ कर के दिल बहला रहे हो क्या जहाँ वालो अँधेरा लाख रौशन हो उजाला फिर उजाला है नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो ग़म क्या था यहाँ तो बेचने वालों ने गुलशन बेच डाला है
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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तुम जो आओगे तो मौसम दूसरा हो जाएगा लू का झोंका भी चलेगा तो सबा हो जाएगा ज़िंदगी में क़त्ल कर के तुझ को निकला था मगर क्या ख़बर थी फिर तिरा ही सामना हो जाएगा नफ़रतों ने हर तरफ़ से घेर रक्खा है हमें जब ये दीवारें गिरेंगी रास्ता हो जाएगा आँधियों का काम चलना है ग़रज़ इस से नहीं पेड़ पर पत्ता रहेगा या जुदा हो जाएगा क्या ख़बर थी ऐ अमीर-ए-शहर तेरे दौर में साँस लेना जुर्म जीना हादसा हो जाएगा आप पैदा तो करें दस्त-ए-हुनर फिर देखिए आप के हाथों में पत्थर आईना हो जाएगा मेरे होंटों पे हँसी आ कर रहेगी ऐ 'अली' एक दिन ये वाक़िआ' भी देखना हो जाएगा
Ali Ahmad Jalili
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रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है शोलों से बचा शहर तो शबनम से जला है कमरा किसी मानूस सी ख़ुशबू से बसा है जैसे कोई उठ कर अभी बिस्तर से गया है ये बात अलग है कि मैं जीता हूँ अभी तक होने को तो सौ बार मिरा क़त्ल हुआ है फूलों ने चुरा ली हैं मुझे देख के आँखें काँटों ने बड़ी दूर से पहचान लिया है उस सम्त अभी ख़ून के प्यासे हैं हज़ारों इस सम्त बस इक क़तरा-ए-ख़ूँ और बचा है रूदाद-ए-चराग़ाँ तो बहुत ख़ूब है लेकिन क्या जानिए किस किस का लहू इन में जला है इस रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल पे 'अली' छाप है मेरी ये ज़ौक़-ए-सुख़न मुझ को विरासत में मिला है
Ali Ahmad Jalili
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हमारी आँख ने देखे हैं ऐसे मंज़र भी गुलों की शाख़ से लटके हुए थे ख़ंजर भी यहाँ वहाँ के अँधेरों का क्या करें मातम कि इस से बढ़ के अँधेरे हैं दिल के अंदर भी अभी से हाथ महकने लगे हैं क्यूँँ मेरे अभी तो देखा नहीं है बदन को छू कर भी किसे तलाश करें अब नगर नगर लोगों जवाब देते नहीं हैं भरे हुए घर भी हमारी तिश्ना-लबी पर न कोई बूँद गिरी घटाएँ जा चुकीं चारों तरफ़ बरस कर भी ये ख़ून रंग-ए-चमन में बदल भी सकता है ज़रा ठहर कि बदल जाएँगे ये मंज़र भी 'अली' अभी तो बहुत सी हैं अन-कही बातें कि ना-तमाम ग़ज़ल है तमाम हो कर भी
Ali Ahmad Jalili
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एक खिड़की गली की खुली रात भर मुंतज़िर जाने किस की रही रात भर हम जलाते रहे अपने दिल के दिए तीरगी क़त्ल होती रही रात भर मेरी आँखों को कर के अता रतजगे मेरी तन्हाई सोती रही रात भर एक ख़ुशबू दराज़ों से छनती हुई दस्तकें जैसे देती रही रात भर दिल के अंदर कोई जैसे चलता रहा चाप क़दमों की आती रही रात भर एक तहरीर जो उस के हाथों की थी बात वो मुझ से करती रही रात भर एक सूरत 'अली' थी जो जान-ए-ग़ज़ल मेरे शे'रों में ढलती रही रात भर
Ali Ahmad Jalili
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