har koi dil ki hatheli pe hai sahra rakkhe kis ko sairab kare vo kise pyasa rakkhe umr bhar kaun nibhata hai taalluq itna ai miri jaan ke dushman tujhe allah rakkhe ham ko achchha nahin lagta koi hamnam tira koi tujh sa ho to phir naam bhi tujh sa rakkhe dil bhi pagal hai ki us shakhs se vabasta hai jo kisi aur ka hone de na apna rakkhe kam nahin tama-e-ibadat bhi to hirs-e-zar se faqr to vo hai ki jo diin na duniya rakkhe hans na itna bhi faqiron ke akele-pan par ja khuda meri tarah tujh ko bhi tanha rakkhe ye qanaat hai itaat hai ki chahat hai 'faraz' ham to raazi hain vo jis haal men jaisa rakkhe har koi dil ki hatheli pe hai sahra rakkhe kis ko sairab kare wo kise pyasa rakkhe umr bhar kaun nibhata hai talluq itna ai meri jaan ke dushman tujhe allah rakkhe hum ko achchha nahin lagta koi hamnam tera koi tujh sa ho to phir nam bhi tujh sa rakkhe dil bhi pagal hai ki us shakhs se wabasta hai jo kisi aur ka hone de na apna rakkhe kam nahin tama-e-ibaadat bhi to hirs-e-zar se faqr to wo hai ki jo din na duniya rakkhe hans na itna bhi faqiron ke akele-pan par ja khuda meri tarah tujh ko bhi tanha rakkhe ye qanaat hai itaat hai ki chahat hai 'faraaz' hum to raazi hain wo jis haal mein jaisa rakkhe
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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क्यूँँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन! इतनी आसानियों से मरती नहीं जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़ ज़िन्दगी उस तरह गुज़रती नहीं
Ahmad Faraz
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क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे जो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम का दुख नहीं पर दिल ये चाहता है कि आग़ाज़ तू करे तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए ता-ज़िंदगी ये दिल न कोई आरज़ू करे तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र अब कोई हादसा ही तिरे रू-ब-रू करे चुप-चाप अपनी आग में जलते रहो 'फ़राज़' दुनिया तो अर्ज़-ए-हाल से बे-आबरू करे
Ahmad Faraz
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ख़ामोश हो क्यूँँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँँ नहीं देते बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँँ नहीं देते वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँँ नहीं देते इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँँ नहीं देते मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँँ नहीं देते क्या बीत गई अब के 'फ़राज़' अहल-ए-चमन पर यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँँ नहीं देते
Ahmad Faraz
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उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़ ऐ मर्ग-ए-ना-गहाँ तिरा आना बहुत हुआ हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ अब क्यूँँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो फिर क्या था एक हूँ का बहाना बहुत हुआ लो फिर तिरे लबों पे उसी बे-वफ़ा का ज़िक्र अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा न बहुत हुआ
Ahmad Faraz
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करूँँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के मैं कैसे बात करूँँ अब कहाँ से लाऊँ उसे मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है 'फ़राज़' अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे
Ahmad Faraz
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