ghazalKuch Alfaaz

हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखें शबनम कभी शो'ला कभी तूफ़ान हैं आँखें आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती तुलता है बशर जिस में वो मीज़ान हैं आँखें आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आँखें लब कुछ भी कहें इस से हक़ीक़त नहीं खुलती इंसान के सच झूट की पहचान हैं आँखें आँखें न झुकीं तेरी किसी ग़ैर के आगे दुनिया में बड़ी चीज़ मिरी जान! हैं आँखें

Related Ghazal

पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

158 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

95 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

292 likes

More from Sahir Ludhianvi

फ़न जो नादार तक नहीं पहुँचा अभी मेआ'र तक नहीं पहुँचा उस ने बर-वक़्त बे-रुख़ी बरती शौक़ आज़ार तक नहीं पहुँचा अक्स-ए-मय हो कि जल्वा-ए-गुल हो रंग-ए-रुख़्सार तक नहीं पहुँचा हर्फ़-ए-इंकार सर बुलंद रहा ज़ोफ़-ए-इक़रार तक नहीं पहुँचा हुक्म-ए-सरकार की पहुँच मत पूछ अहल-ए-सरकार तक नहीं पहुँचा अद्ल-गाहें तो दूर की शय हैं क़त्ल अख़बार तक नहीं पहुँचा इन्क़िलाबात-ए-दहर की बुनियाद हक़ जो हक़दार तक नहीं पहुँचा वो मसीहा-नफ़स नहीं जिस का सिलसिला-दार तक नहीं पहुँचा

Sahir Ludhianvi

2 likes

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहाँ सो रही है तू आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर सलीब से इस रेंगती हयात का कब तक उठाएँ बार बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से हर गाम पर है मजमा-ए-उश्शाक़ मुंतज़िर मक़्तल की राह मिलती है कू-ए-हबीब से इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से

Sahir Ludhianvi

3 likes

सज़ा का हाल सुनाएँ जज़ा की बात करें ख़ुदा मिला हो जिन्हें वो ख़ुदा की बात करें उन्हें पता भी चले और वो ख़फ़ा भी न हों इस एहतियात से क्या मुद्दआ' की बात करें हमारे अहद की तहज़ीब में क़बा ही नहीं अगर क़बा हो तो बंद-ए-क़बा की बात करें हर एक दौर का मज़हब नया ख़ुदा लाया करें तो हम भी मगर किस ख़ुदा की बात करें वफ़ा-शिआर कई हैं कोई हसीं भी तो हो चलो फिर आज उसी बे-वफ़ा की बात करें

Sahir Ludhianvi

6 likes

मोहब्बत तर्क की मैं ने गरेबाँ सी लिया मैं ने ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैं ने बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो बहुत दुख सह लिए मैं ने बहुत दिन जी लिया मैं ने

Sahir Ludhianvi

0 likes

सदियों से इंसान ये सुनता आया है दुख की धूप के आगे सुख का साया है हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है झूट तो क़ातिल ठहरा इस का क्या रोना सच ने भी इंसाँ का ख़ूँ बहाएा है पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं इस मक़्तल में कौन हमें ले आया है अव्वल अव्वल जिस दिल ने बर्बाद किया आख़िर आख़िर वो दिल ही काम आया है इतने दिन एहसान किया दीवानों पर जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है

Sahir Ludhianvi

14 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Sahir Ludhianvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Sahir Ludhianvi's ghazal.