ghazalKuch Alfaaz

जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर दी तुझ से किस तरह मैं इज़्हार-ए-तमन्ना करता लफ़्ज़ सूझा तो मुआ'नी ने बग़ावत कर दी मैं तो समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी तुझ को पूजा है कि असनाम-परस्ती की है मैं ने वहदत के मफ़ाहीम की कसरत कर दी मुझ को दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है तिरी उल्फ़त ने मोहब्बत मिरी आदत कर दी पूछ बैठा हूँ मैं तुझ से तिरे कूचे का पता तेरे हालात ने कैसी तिरी सूरत कर दी क्या तिरा जिस्म तिरे हुस्न की हिद्दत में जला राख किस ने तिरी सोने की सी रंगत कर दी

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम

Jaun Elia

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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो

Ahmad Nadeem Qasmi

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तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ

Ahmad Nadeem Qasmi

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फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए

Ahmad Nadeem Qasmi

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जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ सूरज को ग़ुरूब से बचाऊँ बस मेरा चले जो गर्दिशों पर दिन को भी न चाँद को बुझाऊँ मैं छोड़ के सीधे रास्तों को भटकी हुई नेकियाँ कमाऊँ इम्कान पे इस क़दर यक़ीं है सहराओं में बीज डाल आऊँ मैं शब के मुसाफ़िरों की ख़ातिर मिशअल न मिले तो घर जलाऊँ अश'आर हैं मेरे इस्तिआरे आओ तुम्हें आइने दिखाऊँ यूँँ बट के बिखर के रह गया हूँ हर शख़्स में अपना अक्स पाऊँ आवाज़ जो दूँ किसी के दर पर अंदर से भी ख़ुद निकल के आऊँ ऐ चारागरान-ए-अस्र-ए-हाज़िर फ़ौलाद का दिल कहाँ से लाऊँ हर रात दुआ करूँँ सहर की हर सुब्ह नया फ़रेब खाऊँ हर जब्र पे सब्र कर रहा हूँ इस तरह कहीं उजड़ न जाऊँ रोना भी तो तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू है आँखें जो रुकें तो लब हिलाऊँ ख़ुद को तो 'नदीम' आज़माया अब मर के ख़ुदा को आज़माऊँ

Ahmad Nadeem Qasmi

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मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता एक ज़र्रा भी तो बे-कार नहीं हो सकता इस क़दर प्यार है इंसाँ की ख़ताओं से मुझे कि फ़रिश्ता मिरा मेआ'र नहीं हो सकता ऐ ख़ुदा फिर ये जहन्नम का तमाशा क्या है तेरा शहकार तो फ़िन्नार नहीं हो सकता ऐ हक़ीक़त को फ़क़त ख़्वाब समझने वाले तू कभी साहिब-ए-असरार नहीं हो सकता तू कि इक मौजा-ए-निकहत से भी चौंक उठता है हश्र आता है तो बेदार नहीं हो सकता सर-ए-दीवार ये क्यूँँ निर्ख़ की तकरार हुई घर का आँगन कभी बाज़ार नहीं हो सकता राख सी मज्लिस-ए-अक़्वाम की चुटकी में है क्या कुछ भी हो ये मिरा पिंदार नहीं हो सकता इस हक़ीक़त को समझने में लुटाया क्या कुछ मेरा दुश्मन मिरा ग़म-ख़्वार नहीं हो सकता मैं ने भेजा तुझे ऐवान-ए-हुकूमत में मगर अब तो बरसों तिरा दीदार नहीं हो सकता तीरगी चाहे सितारों की सिफ़ारिश लाए रात से मुझ को सरोकार नहीं हो सकता वो जो शे'रों में है इक शय पस-ए-अल्फ़ाज़ 'नदीम' उस का अल्फ़ाज़ में इज़हार नहीं हो सकता

Ahmad Nadeem Qasmi

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