ghazalKuch Alfaaz

फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा

Tehzeeb Hafi

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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi

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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो

Ahmad Nadeem Qasmi

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तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ

Ahmad Nadeem Qasmi

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जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर दी तुझ से किस तरह मैं इज़्हार-ए-तमन्ना करता लफ़्ज़ सूझा तो मुआ'नी ने बग़ावत कर दी मैं तो समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी तुझ को पूजा है कि असनाम-परस्ती की है मैं ने वहदत के मफ़ाहीम की कसरत कर दी मुझ को दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है तिरी उल्फ़त ने मोहब्बत मिरी आदत कर दी पूछ बैठा हूँ मैं तुझ से तिरे कूचे का पता तेरे हालात ने कैसी तिरी सूरत कर दी क्या तिरा जिस्म तिरे हुस्न की हिद्दत में जला राख किस ने तिरी सोने की सी रंगत कर दी

Ahmad Nadeem Qasmi

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साँस लेना भी सज़ा लगता है अब तो मरना भी रवा लगता है कोह-ए-ग़म पर से जो देखूँ तो मुझे दश्त आग़ोश-ए-फ़ना लगता है सर-ए-बाज़ार है यारों की तलाश जो गुज़रता है ख़फ़ा लगता है मौसम-ए-गुल में सर-ए-शाख़-ए-गुलाब शो'ला भड़के तो बजा लगता है मुस्कुराता है जो इस आलम में ब-ख़ुदा मुझ को ख़ुदा लगता है इतना मानूस हूँ सन्नाटे से कोई बोले तो बुरा लगता है उन से मिल कर भी न काफ़ूर हुआ दर्द ये सब से जुदा लगता है नुत्क़ का साथ नहीं देता ज़ेहन शुक्र करता हूँ गिला लगता है इस क़दर तुंद है रफ़्तार-ए-हयात वक़्त भी रिश्ता-बपा लगता है

Ahmad Nadeem Qasmi

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तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ हुस्न-ए-यज़्दाँ से तुझे हुस्न-ए-बुताँ तक देखूँ तू ने यूँँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था मैं तो दिल में तेरे क़दमों के निशाँ तक देखूँ सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी हैं हज़ारों बातें मैं तेरा हुस्न तेरे हुस्न-ए-बयाँ तक देखूँ मेरे वीराना-ए-जाँ में तेरी यादों के तुफ़ैल फूल खिलते नज़र आते हैं जहाँ तक देखूँ वक़्त ने ज़ेहन में धुँदला दिए तेरे ख़द-ओ-ख़ाल यूँँ तो मैं टूटते तारों का धुआँ तक देखूँ दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता मैं फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ इक हक़ीक़त सही फ़िरदौस में हूरों का वजूद हुस्न-ए-इंसाँ से निमट लूँ तो वहाँ तक देखूँ

Ahmad Nadeem Qasmi

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