ghazalKuch Alfaaz

तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ हुस्न-ए-यज़्दाँ से तुझे हुस्न-ए-बुताँ तक देखूँ तू ने यूँँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था मैं तो दिल में तेरे क़दमों के निशाँ तक देखूँ सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी हैं हज़ारों बातें मैं तेरा हुस्न तेरे हुस्न-ए-बयाँ तक देखूँ मेरे वीराना-ए-जाँ में तेरी यादों के तुफ़ैल फूल खिलते नज़र आते हैं जहाँ तक देखूँ वक़्त ने ज़ेहन में धुँदला दिए तेरे ख़द-ओ-ख़ाल यूँँ तो मैं टूटते तारों का धुआँ तक देखूँ दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता मैं फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ इक हक़ीक़त सही फ़िरदौस में हूरों का वजूद हुस्न-ए-इंसाँ से निमट लूँ तो वहाँ तक देखूँ

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ

Ahmad Nadeem Qasmi

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फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए

Ahmad Nadeem Qasmi

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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो

Ahmad Nadeem Qasmi

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अँधेरी रात को ये मो'जिज़ा दिखाएँगे हम चराग़ अगर न जला अपना दिल जलाएँगे हम हमारी कोहकनी के हैं मुख़्तलिफ़ मेआ'र पहाड़ काट के रस्ते नए बनाएँगे हम जुनून-ए-इश्क़ पे तनक़ीद अपना काम नहीं गुलों को नोच के क्यूँँ तितलियाँ उड़ाएँगे हम जो दिल दुखा है तो ये अज़्म भी मिला है हमें तमाम उम्र किसी का न दिल दुखाएँगे हम अगर है मौत में कुछ लुत्फ़ तो बस इतना है कि इस के बा'द ख़ुदा का सुराग़ पाएँगे हम हमें तो क़ब्र भी तन्हा न कर सकेगी 'नदीम' कि हर तरफ़ से ज़मीं को क़रीब पाएँगे हम

Ahmad Nadeem Qasmi

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जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ सूरज को ग़ुरूब से बचाऊँ बस मेरा चले जो गर्दिशों पर दिन को भी न चाँद को बुझाऊँ मैं छोड़ के सीधे रास्तों को भटकी हुई नेकियाँ कमाऊँ इम्कान पे इस क़दर यक़ीं है सहराओं में बीज डाल आऊँ मैं शब के मुसाफ़िरों की ख़ातिर मिशअल न मिले तो घर जलाऊँ अश'आर हैं मेरे इस्तिआरे आओ तुम्हें आइने दिखाऊँ यूँँ बट के बिखर के रह गया हूँ हर शख़्स में अपना अक्स पाऊँ आवाज़ जो दूँ किसी के दर पर अंदर से भी ख़ुद निकल के आऊँ ऐ चारागरान-ए-अस्र-ए-हाज़िर फ़ौलाद का दिल कहाँ से लाऊँ हर रात दुआ करूँँ सहर की हर सुब्ह नया फ़रेब खाऊँ हर जब्र पे सब्र कर रहा हूँ इस तरह कहीं उजड़ न जाऊँ रोना भी तो तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू है आँखें जो रुकें तो लब हिलाऊँ ख़ुद को तो 'नदीम' आज़माया अब मर के ख़ुदा को आज़माऊँ

Ahmad Nadeem Qasmi

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