मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता एक ज़र्रा भी तो बे-कार नहीं हो सकता इस क़दर प्यार है इंसाँ की ख़ताओं से मुझे कि फ़रिश्ता मिरा मेआ'र नहीं हो सकता ऐ ख़ुदा फिर ये जहन्नम का तमाशा क्या है तेरा शहकार तो फ़िन्नार नहीं हो सकता ऐ हक़ीक़त को फ़क़त ख़्वाब समझने वाले तू कभी साहिब-ए-असरार नहीं हो सकता तू कि इक मौजा-ए-निकहत से भी चौंक उठता है हश्र आता है तो बेदार नहीं हो सकता सर-ए-दीवार ये क्यूँँ निर्ख़ की तकरार हुई घर का आँगन कभी बाज़ार नहीं हो सकता राख सी मज्लिस-ए-अक़्वाम की चुटकी में है क्या कुछ भी हो ये मिरा पिंदार नहीं हो सकता इस हक़ीक़त को समझने में लुटाया क्या कुछ मेरा दुश्मन मिरा ग़म-ख़्वार नहीं हो सकता मैं ने भेजा तुझे ऐवान-ए-हुकूमत में मगर अब तो बरसों तिरा दीदार नहीं हो सकता तीरगी चाहे सितारों की सिफ़ारिश लाए रात से मुझ को सरोकार नहीं हो सकता वो जो शे'रों में है इक शय पस-ए-अल्फ़ाज़ 'नदीम' उस का अल्फ़ाज़ में इज़हार नहीं हो सकता
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो
Ahmad Nadeem Qasmi
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तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ
Ahmad Nadeem Qasmi
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जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ सूरज को ग़ुरूब से बचाऊँ बस मेरा चले जो गर्दिशों पर दिन को भी न चाँद को बुझाऊँ मैं छोड़ के सीधे रास्तों को भटकी हुई नेकियाँ कमाऊँ इम्कान पे इस क़दर यक़ीं है सहराओं में बीज डाल आऊँ मैं शब के मुसाफ़िरों की ख़ातिर मिशअल न मिले तो घर जलाऊँ अश'आर हैं मेरे इस्तिआरे आओ तुम्हें आइने दिखाऊँ यूँँ बट के बिखर के रह गया हूँ हर शख़्स में अपना अक्स पाऊँ आवाज़ जो दूँ किसी के दर पर अंदर से भी ख़ुद निकल के आऊँ ऐ चारागरान-ए-अस्र-ए-हाज़िर फ़ौलाद का दिल कहाँ से लाऊँ हर रात दुआ करूँँ सहर की हर सुब्ह नया फ़रेब खाऊँ हर जब्र पे सब्र कर रहा हूँ इस तरह कहीं उजड़ न जाऊँ रोना भी तो तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू है आँखें जो रुकें तो लब हिलाऊँ ख़ुद को तो 'नदीम' आज़माया अब मर के ख़ुदा को आज़माऊँ
Ahmad Nadeem Qasmi
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एहसास में फूल खिल रहे हैं पतझड़ के अजीब सिलसिले हैं कुछ इतनी शदीद तीरगी है आँखों में सितारे तैरते हैं देखें तो हवा जमी हुई है सोचें तो दरख़्त झूमते हैं सुक़रात ने ज़हर पी लिया था हम ने जीने के दुख सहे हैं हम तुझ से बिगड़ के जब भी उठे फिर तेरे हुज़ूर आ गए हैं हम अक्स हैं एक दूसरे का चेहरे ये नहीं हैं आइने हैं लम्हों का ग़ुबार छा रहा है यादों के चराग़ जल रहे हैं सूरज ने घने सनोबरों में जाले से शुआ'ओं के बुने हैं यकसाँ हैं फ़िराक़-ओ-वस्ल दोनों ये मरहले एक से कड़े हैं पा कर भी तो नींद उड़ गई थी खो कर भी तो रत-जगे मिले हैं जो दिन तिरी याद में कटे थे माज़ी के खंडर बने खड़े हैं जब तेरा जमाल ढूँडते थे अब तेरा ख़याल ढूँडते हैं हम दिल के गुदाज़ से हैं मजबूर जब ख़ुश भी हुए तो रोए हैं हम ज़िंदा हैं ऐ फ़िराक़ की रात प्यारी तिरे बाल क्यूँँ खुले हैं
Ahmad Nadeem Qasmi
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फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए
Ahmad Nadeem Qasmi
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