ghazalKuch Alfaaz

जैसा हूँ वैसा क्यूँँ हूँ समझा सकता था मैं तुम ने पूछा तो होता बतला सकता था मैं आसूदा रहने की ख़्वाहिश मार गई वर्ना आगे और बहुत आगे तक जा सकता था मैं कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शे'र इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं जैसे सब लिखते रहते हैं ग़ज़लें नज़्में गीत वैसे लिख लिख कर अम्बार लगा सकता था मैं

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है यहाँ वा'दों की अर्ज़ानी बहुत है शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं मगर लहजों में वीरानी बहुत है सुबुक-ज़र्फ़ों के क़ाबू में नहीं लफ़्ज़ मगर शौक़-ए-गुल-अफ़्शानी बहुत है है बाज़ारों में पानी सर से ऊँचा मिरे घर में भी तुग़्यानी बहुत है न जाने कब मिरे सहरा में आए वो इक दरिया कि तूफ़ानी बहुत है न जाने कब मिरे आँगन में बरसे वो इक बादल कि नुक़सानी बहुत है

Iftikhar Arif

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कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम बदल गए तो बदलने पे इतनी हैरत क्या क़िमार-ख़ाना-ए-हस्ती में एक बाज़ी पर तमाम उम्र लगा दी तो फिर शिकायत क्या फ़रोग़-ए-सनअत-ए-क़द-आवरी का मौसम है सुबुक हुए पे भी निकला है क़द्द-ओ-क़ामत क्या

Iftikhar Arif

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वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बे-वफ़ाई में भी मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी लहू की आग में जल-बुझ गए बदन तो खुला रसाई में भी ख़सारा है ना-रसाई में भी बदलते रहते हैं मौसम गुज़रता रहता है वक़्त मगर ये दिल कि वहीं का वहीं जुदाई में भी लिहाज़-ए-हुर्मत-ए-पैमाँ न पास-ए-हम-ख़्वाबी अजब तरह के तसादुम थे आशनाई में भी मैं दस बरस से किसी ख़्वाब के अज़ाब में हूँ वही अज़ाब दर आया है इस दहाई में भी तसादुम-ए-दिल-ओ-दुनिया में दिल की हार के बा'द हिजाब आने लगा है ग़ज़ल-सराई में भी मैं जा रहा हूँ अब उस की तरफ़ उसी की तरफ़ जो मेरे साथ था मेरी शिकस्ता-पाई में भी

Iftikhar Arif

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थकन तो अगले सफ़र के लिए बहाना था उसे तो यूँँ भी किसी और सम्त जाना था वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी उसी पे ज़र्ब पड़ी जो शजर पुराना था मता-ए-जाँ का बदल एक पल की सरशारी सुलूक ख़्वाब का आँखों से ताजिराना था हवा की काट शगूफ़ों ने जज़्ब कर ली थी तभी तो लहजा-ए-ख़ुशबू भी जारेहाना था वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था क़बा-ए-ज़र्द निगार-ए-ख़िज़ाँ पे सजती थी तभी तो चाल का अंदाज़ ख़ुसरवाना था

Iftikhar Arif

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कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में ये वक़्त किस की र'ऊनत पे ख़ाक डाल गया ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में यही है मस्लहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में

Iftikhar Arif

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