ghazalKuch Alfaaz

जलवे तुझे दिखाएँगे बस इंतिज़ार कर हम कौन हैं बताएँगे बस इंतिज़ार कर जी भर के हम को ख़ून के आँसू रूला तू आज कल हम तुझे रुलाएँगे बस इंतिज़ार कर जब तक क़लम से काम चलेगा चलाएँगे फिर तेग़ भी उठाएँगे बस इंतिज़ार कर ख़ामोश हैं तो गूँगा समझ बैठा है हमें हम शोर भी मचाएँगे बस इंतिज़ार कर मसनद पे तुझ को हम ने बिठाया है ये न भूल हम ही तुझे उठाएँगे बस इंतिज़ार कर

Varun Anand24 Likes

Related Ghazal

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

158 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

More from Varun Anand

कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए

Varun Anand

11 likes

ये शोख़ियाँ ये जवानी कहाँ से लाएँ हम तुम्हारे हुस्न का सानी कहाँ से लाएँ हम मोहब्बतें वो पुरानी कहाँ से लाएँ हम रुकी नदी में रवानी कहाँ से लाएँ हम हमारी आँख है पैवस्त एक सहरा में अब ऐसी आँख में पानी कहाँ से लाएँ हम हर एक लफ़्ज़ के मा'नी तलाशते हो तुम हर एक लफ़्ज़ का मा'नी कहाँ से लाएँ हम चलो बता दें ज़माने को अपने बारे में कि रोज़ झूटी कहानी कहाँ से लाएँ हम

Varun Anand

13 likes

मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के निकले हैं मिरे ज़ख़्म तलबगार नमक के आया कोई सैलाब कहानी में अचानक और घुल गए पानी में वो किरदार नमक के दोनों ही किनारों पे थी बीमारों की मज्लिस इस पार थे मीठे के तो उस पार नमक के उस ने ही दिए ज़ख़्म ये गर्दन पे हमारी फिर उस ने ही पहनाए हमें हार नमक के कहती थी ग़ज़ल मुझ को है मरहम की ज़रूरत और देते रहे सब उसे अश'आर नमक के जिस सम्त मिला करती थीं ज़ख़्मों की दवाएँ सुनते हैं कि अब हैं वहाँ बाज़ार नमक के

Varun Anand

9 likes

ख़ुद अपने ख़ून में पहले नहाएा जाता है वक़ार ख़ुद नहीं बनता बनाया जाता है कभी कभी जो परिंदे भी अन-सुना कर दें तो हाल दिल का शजर को सुनाया जाता है हमारी प्यास को ज़ंजीर बाँधी जाती है तुम्हारे वास्ते दरिया बहाएा जाता है नवाज़ता है वो जब भी अज़ीज़ों को अपने तो सब से बा'द में हम को बुलाया जाता है हमीं तलाश के देते हैं रास्ता सब को हमीं को बा'द में रास्ता दिखाया जाता है

Varun Anand

9 likes

ये शोख़ियाँ ये जवानी कहाँ से लाएँ हम तुम्हारे हुस्न का सानी कहाँ से लाएँ हम मोहब्बतें वो पुरानी कहाँ से लाएँ हम रुकी नदी में रवानी कहाँ से लाएँ हम हमारी आँख है पैवस्त एक सहरा में अब ऐसी आँख में पानी कहाँ से लाएँ हम हर एक लफ़्ज़ के मा'नी तलाशते हो तुम हर एक लफ़्ज़ का मा'नी कहाँ से लाएँ हम चलो बता दें ज़माने को अपने बारे में कि रोज़ झूटी कहानी कहाँ से लाएँ हम

Varun Anand

18 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Varun Anand.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Varun Anand's ghazal.