जो इस्म-ओ-जिस्म को बाहम निभाने वाला नहीं मैं ऐसे इश्क़ पर ईमान लाने वाला नहीं मैं पाँव धोके पि यूँ, यार बनके जो आए मुनाफ़िक़ों को तो मैं मुँह लगाने वाला नहीं बस इतना जान ले ऐ पुर-कशिश के दिल तुझ सेे बहल तो सकता है पर तुझ पे आने वाला नहीं तुझे किसी ने ग़लत कह दिया मेरे बारे नहीं मियाँ मैं दिलों को दुखाने वाला नहीं सुन ऐ काबिला-ए-कुफी-दिलाँ मुकर्रर सुन अली कभी भी हजीमत उठाने वाला नहीं
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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हालत ए हिज्र में हूँ यार मेरी सम्त न देख तू न हो जाए गिरफ्तार, मेरी सम्त न देख आस्तीन में जो छूपे सांप हैं उन को तो निकाल अपने नुक़सान पर हर बार मेरी सम्त न देख तुझ को जिस बात का 'ख़द्शा' है वो हो सकती है ऐसे नश्शे में लगातार मेरी सम्त न देख या कोई बात सुना या मुझे सीने से लगा इस तरह बैठ कर बेकार मेरी सम्त न देख तेरा यारों से नहीं जेब से याराना है ऐ मोहब्बत के दुकाँदार मेरी सम्त न देख
Ali Zaryoun
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चुप-चाप क्यूँ फिरो हो कोई बात तो करो हल भी निकालते हैं मुलाक़ात तो करो ख़ाली हवा में उड़ना फकीरी नहीं मियाँ दिल जोड़ के दिखाओ करामात तो करो
Ali Zaryoun
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चरागाहें नई आबाद होगी मगर जो बस्तियाँ बर्बाद होगी ख़ुदा मिट्टी को फिर से हुक्म देगा कई शक्लें नई ईजाद होगी अभी मुमकिन नहीं लेकिन ये होगा किताबें साहिब-ए-औलाद होगी मैं उन आँखों को पढ़ कर सोचता हूँ ये नज्में किस तरह से याद होगी ये परियाँ फिर नहीं आएगी मिलने ये ग़ज़लें फिर नहीं इरशाद होगी मैं डरता हूँ अली उन आदतों से के जो मुझ को तुम्हारे बा'द होगी
Ali Zaryoun
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ख़्वाब का ख़्वाब हक़ीक़त की हक़ीक़त समझें ये समझना है तो फिर पहले तरीक़त समझें मैं जवाबन भी जिन्हें गाली नहीं देता वो लोग मेरी जानिब से इसे ख़ास मोहब्बत समझें मैं तो मर कर भी न बेचूँगा कभी यार का नाम आप ताजिर हैं नुमाइश को इबादत समझें मैं किसी बीच के रस्ते से नहीं पहुँचा यहाँ हासिदों से ये गुज़ारिश है रियाज़त समझें मेरा बे-साख़्ता-पन उन के लिए ख़तरा है साख़्ता लोग मुझे क्यूँँ न मुसीबत समझें फेसबुक वक़्त अगर दे तो ये प्यारे बच्चे अपने ख़ामोश बुज़ुर्गों की शिकायत समझें पेश करता हूँ मैं ख़ुद अपनी गिरफ़्तारी 'अली' उन से कहना कि मुझे ज़ेर-ए-हिरासत समझें
Ali Zaryoun
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लहजे में खनक बात में दम है तो करम है गर्दन दर-ए-हैदर पे जो ख़म है तो करम है मत सोच कि इस घर पे करम है तो अलम है दरअस्ल तेरे घर पे अलम है तो करम है बिस्तर पे कमर ठीक नहीं लगती तो ख़ुश हो ख़ुराक भी ऐ यार जो कम है तो करम है बे-निस्बत-ओ-बे-इश्क़ कहाँ मिलती है इज़्ज़त मुझ पे मेरे मौला का करम है तो करम है मुंकिर की जलन ही में तो मोमिन का मज़ा है गर ता'ना-ओ-तश्नी-ओ-सितम है तो करम है अब जब के कोई हाल भी क्यूँँ पूछे किसी का इक आँख मेरे वास्ते नम है तो करम है अब जब के कोई आँख नहीं रुकती किसी पर जो कोई जहाँ जिस का सनम है तो करम है मिदहत का मज़ा भी हो तग़ज़्ज़ुल की अदा भी कुछ ऐसा सुख़न तुझ को बहम है तो करम है अख़्तर से ग़ज़ल-साज़ों के होते हुए 'ज़रयून' थोड़ा सा अगर तेरा भरम है तो करम है
Ali Zaryoun
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