कब वो सुनता है कहानी मेरी और फिर वो भी ज़बानी मेरी ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी क्या बयाँ कर के मिरा रोएँगे यार मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी हूँ ज़-ख़ुद रफ़्ता-ए-बैदा-ए-ख़याल भूल जाना है निशानी मेरी मुतक़ाबिल है मुक़ाबिल मेरा रुक गया देख रवानी मेरी क़द्र-ए-संग-ए-सर-ए-रह रखता हूँ सख़्त अर्ज़ां है गिरानी मेरी गर्द-बाद-ए-रह-ए-बेताबी हूँ सरसर-ए-शौक़ है बानी मेरी दहन उस का जो न मालूम हुआ खुल गई हेच मदानी मेरी कर दिया ज़ोफ़ ने आजिज़ 'ग़ालिब' नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो आदमी ही मुझे रहने दो ख़ुदा मत समझो ये जो मैं होश में रहता नहीं तुम सेे मिल कर ये मिरा इश्क़ है तुम इस को नशा मत समझो रास आता नहीं सब को ये मोहब्बत का मरज़ मेरी बीमारी को तुम अपनी दवा मत समझो
Shakeel Azmi
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम
Mirza Ghalib
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दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ हैं ज़वाल-आमादा अज्ज़ा आफ़रीनश के तमाम महर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ है तरह्हुम-आफ़रीं आराइश-ए-बे-दाद याँ अश्क-ए-चश्म-ए-दाम है हर दाना-ए-सय्याद याँ है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद याँ ना-गवारा है हमें एहसान-ए-साहब-दाैलताँ है ज़र-ए-गुल भी नज़र में जौहर-ए-फ़ौलाद याँ जुम्बिश-ए-दिल से हुए हैं उक़्दा-हा-ए-कार वा कम-तरीं मज़दूर-ए-संगीं-दस्त है फ़रहाद याँ क़तरा-हा-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल ज़ेब-ए-दामाँ हैं 'असद' है तमाशा करदनी गुल-चीनी-ए-जल्लाद याँ
Mirza Ghalib
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रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से बाल-ए-तदर्रव जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का ने भागने की गूँ न इक़ामत की ताब है जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँ है शश-जिहत ग़ाफ़िल गुमाँ करे है कि गेती ख़राब है नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँँ माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है गुज़रा 'असद' मसर्रत-ए-पैग़ाम-ए-यार से क़ासिद पे मुझ को रश्क-ए-सवाल-ओ-जवाब है ज़ाहिर है तर्ज़-ए-क़ैद से सय्याद की ग़रज़ जो दाना दाम में है सो अश्क-ए-कबाब है बे-चश्म-ए-दिल न कर हवस-ए-सैर-ए-लाला-ज़ार या'नी ये हर वरक़ वरक़-ए-इंतिख़ाब है
Mirza Ghalib
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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
Mirza Ghalib
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ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं ग़ैर की बात बिगड़ जाए तो कुछ दूर नहीं वादा-ए-सैर-ए-गुलिस्ताँ है ख़ुशा ताले-ए-शौक़ मुज़्दा-ए-क़त्ल मुक़द्दर है जो मज़कूर नहीं शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं हसरत ऐ ज़ौक़-ए-ख़राबी कि वो ताक़त न रही इश्क़-ए-पुर-अरबदा की गूँ तन-ए-रंजूर नहीं मैं जो कहता हूँ कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हें किस र'ऊनत से वो कहते हैं कि हम हूर नहीं ज़ुल्म कर ज़ुल्म अगर लुत्फ़ दरेग़ आता हो तू तग़ाफ़ुल में किसी रंग से मा'ज़ूर नहीं साफ़ दुर्दी-कश-ए-पैमाना-ए-जम हैं हम लोग वाए वो बादा कि अफ़्शुर्दा-ए-अंगूर नहीं हूँ ज़ुहूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई 'ग़ालिब' मेरे दावे पे ये हुज्जत है कि मशहूर नहीं
Mirza Ghalib
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