ghazalKuch Alfaaz

kahan aa ke rukne the raste kahan mod tha use bhuul ja vo jo mil gaya use yaad rakh jo nahin mila use bhuul ja vo tire nasib ki barishen kisi aur chhat pe baras gaiin dil-e-be-khabar miri baat sun use bhuul ja use bhuul ja main to gum tha tere hi dhyan men tiri aas tere guman men saba kah gai mire kaan men mire saath aa use bhuul ja kisi aankh men nahin ashk-e-ghham tire baa'd kuchh bhi nahin hai kam tujhe zindagi ne bhula diya tu bhi muskura use bhuul ja kahin chak-e-jan ka rafu nahin kisi astin pe lahu nahin ki shahid-e-rah-e-malal ka nahin khun-baha use bhuul ja kyuun ata hua hai ghhubar men ghham-e-zindagi ke fishar men vo jo dard tha tire bakht men so vo ho gaya use bhuul ja tujhe chand ban ke mila tha jo tire sahilon pe khila tha jo vo tha ek dariya visal ka so utar gaya use bhuul ja kahan aa ke rukne the raste kahan mod tha use bhul ja wo jo mil gaya use yaad rakh jo nahin mila use bhul ja wo tere nasib ki barishen kisi aur chhat pe baras gain dil-e-be-khabar meri baat sun use bhul ja use bhul ja main to gum tha tere hi dhyan mein teri aas tere guman mein saba kah gai mere kan mein mere sath aa use bhul ja kisi aankh mein nahin ashk-e-gham tere ba'd kuchh bhi nahin hai kam tujhe zindagi ne bhula diya tu bhi muskura use bhul ja kahin chaak-e-jaan ka rafu nahin kisi aastin pe lahu nahin ki shahid-e-rah-e-malal ka nahin khun-baha use bhul ja kyun ata hua hai ghubar mein gham-e-zindagi ke fishaar mein wo jo dard tha tere bakht mein so wo ho gaya use bhul ja tujhe chand ban ke mila tha jo tere sahilon pe khila tha jo wo tha ek dariya visal ka so utar gaya use bhul ja

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

Umair Najmi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है

Amjad Islam Amjad

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न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर ओ ज़र से हुआ ये मोजज़ा तो मिरे दस्त-ए-बे-हुनर से हुआ क़दम उठा है तो पाँव तले ज़मीं ही नहीं सफ़र का रंज हमें ख़्वाहिश-ए-सफ़र से हुआ मैं भीग भीग गया आरज़ू की बारिश में वो अक्स अक्स में तक़्सीम चश्म-ए-तर से हुआ सियाही शब की न चेहरों पे आ गई हो कहीं सहर का ख़ौफ़ हमें आईनों के डर से हुआ कोई चले तो ज़मीं साथ साथ चलती है ये राज़ हम पे अयाँ गर्द-ए-रहगुज़र से हुआ तिरे बदन की महक ही न थी तो क्या रुकते गुज़र हमारा कई बार यूँँ तो घर से हुआ कहाँ पे सोए थे 'अमजद' कहाँ खुलीं आँखें गुमाँ क़फ़स का हमें अपने बाम-ओ-दर से हुआ

Amjad Islam Amjad

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याद के सहरा में कुछ तो ज़िंदगी आए नज़र सोचता हूँ अब बना लूँ रेत से ही कोई घर किस क़दर यादें उभर आई हैं तेरे नाम से एक पत्थर फेंकने से पड़ गए कितने भँवर वक़्त के अंधे कुएँ में पल रही है ज़िंदगी ऐ मिरे हुस्न-ए-तख़य्युल बाम से नीचे उतर तू असीर-ए-आबरू-ए-शेवा-ए-पिंदार-ए-हुस्न मैं गिरफ़्तार-ए-निगाह-ए-ज़िंदगी-ए-मुख़्तसर ज़ब्त के क़र्ये में 'अमजद' देखिए कैसे कटे सोच की सूनी सड़क पर याद का लम्बा सफ़र

Amjad Islam Amjad

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भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ जब भी आया सामने वो बे-वफ़ा अच्छा लगा

Amjad Islam Amjad

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अगरचे कोई भी अंधा नहीं था लिखा दीवार का पढ़ता नहीं था कुछ ऐसी बर्फ़ थी उस की नज़र में गुज़रने के लिए रस्ता नहीं था तुम्हीं ने कौन सी अच्छाई की है चलो माना कि मैं अच्छा नहीं था खुली आँखों से सारी उम्र देखा इक ऐसा ख़्वाब जो अपना नहीं था मैं उस की अंजुमन में था अकेला किसी ने भी मुझे देखा नहीं था सहर के वक़्त कैसे छोड़ जाता तुम्हारी याद थी सपना नहीं था खड़ी थी रात खिड़की के सिरहाने दरीचे में वो चाँद उतरा नहीं था दिलों में गिरने वाले अश्क चुनता कहीं इक जौहरी ऐसा नहीं था कुछ ऐसी धूप थी उन के सरों पर ख़ुदा जैसे ग़रीबों का नहीं था अभी हर्फ़ों में रंग आते कहाँ से अभी मैं ने उसे लिक्खा नहीं था थी पूरी शक्ल उस की याद मुझ को मगर मैं ने उसे देखा नहीं था बरहना ख़्वाब थे सूरज के नीचे किसी उम्मीद का पर्दा नहीं था है 'अमजद' आज तक वो शख़्स दिल में कि जो उस वक़्त भी मेरा नहीं था

Amjad Islam Amjad

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