ghazalKuch Alfaaz

भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ जब भी आया सामने वो बे-वफ़ा अच्छा लगा

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है

Amjad Islam Amjad

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न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर ओ ज़र से हुआ ये मोजज़ा तो मिरे दस्त-ए-बे-हुनर से हुआ क़दम उठा है तो पाँव तले ज़मीं ही नहीं सफ़र का रंज हमें ख़्वाहिश-ए-सफ़र से हुआ मैं भीग भीग गया आरज़ू की बारिश में वो अक्स अक्स में तक़्सीम चश्म-ए-तर से हुआ सियाही शब की न चेहरों पे आ गई हो कहीं सहर का ख़ौफ़ हमें आईनों के डर से हुआ कोई चले तो ज़मीं साथ साथ चलती है ये राज़ हम पे अयाँ गर्द-ए-रहगुज़र से हुआ तिरे बदन की महक ही न थी तो क्या रुकते गुज़र हमारा कई बार यूँँ तो घर से हुआ कहाँ पे सोए थे 'अमजद' कहाँ खुलीं आँखें गुमाँ क़फ़स का हमें अपने बाम-ओ-दर से हुआ

Amjad Islam Amjad

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याद के सहरा में कुछ तो ज़िंदगी आए नज़र सोचता हूँ अब बना लूँ रेत से ही कोई घर किस क़दर यादें उभर आई हैं तेरे नाम से एक पत्थर फेंकने से पड़ गए कितने भँवर वक़्त के अंधे कुएँ में पल रही है ज़िंदगी ऐ मिरे हुस्न-ए-तख़य्युल बाम से नीचे उतर तू असीर-ए-आबरू-ए-शेवा-ए-पिंदार-ए-हुस्न मैं गिरफ़्तार-ए-निगाह-ए-ज़िंदगी-ए-मुख़्तसर ज़ब्त के क़र्ये में 'अमजद' देखिए कैसे कटे सोच की सूनी सड़क पर याद का लम्बा सफ़र

Amjad Islam Amjad

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अगरचे कोई भी अंधा नहीं था लिखा दीवार का पढ़ता नहीं था कुछ ऐसी बर्फ़ थी उस की नज़र में गुज़रने के लिए रस्ता नहीं था तुम्हीं ने कौन सी अच्छाई की है चलो माना कि मैं अच्छा नहीं था खुली आँखों से सारी उम्र देखा इक ऐसा ख़्वाब जो अपना नहीं था मैं उस की अंजुमन में था अकेला किसी ने भी मुझे देखा नहीं था सहर के वक़्त कैसे छोड़ जाता तुम्हारी याद थी सपना नहीं था खड़ी थी रात खिड़की के सिरहाने दरीचे में वो चाँद उतरा नहीं था दिलों में गिरने वाले अश्क चुनता कहीं इक जौहरी ऐसा नहीं था कुछ ऐसी धूप थी उन के सरों पर ख़ुदा जैसे ग़रीबों का नहीं था अभी हर्फ़ों में रंग आते कहाँ से अभी मैं ने उसे लिक्खा नहीं था थी पूरी शक्ल उस की याद मुझ को मगर मैं ने उसे देखा नहीं था बरहना ख़्वाब थे सूरज के नीचे किसी उम्मीद का पर्दा नहीं था है 'अमजद' आज तक वो शख़्स दिल में कि जो उस वक़्त भी मेरा नहीं था

Amjad Islam Amjad

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रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँँ रोका नहीं यूँँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं क्यूँँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं

Amjad Islam Amjad

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