रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँँ रोका नहीं यूँँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं क्यूँँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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आईनों में अक्स न हों तो हैरत रहती है जैसे ख़ाली आँखों में भी वहशत रहती है हर दम दुनिया के हंगा में घेरे रखते थे जब से तेरे ध्यान लगे हैं फ़ुर्सत रहती है करनी है तो खुल के करो इंकार-ए-वफ़ा की बात बात अधूरी रह जाए तो हसरत रहती है शहर-ए-सुख़न में ऐसा कुछ कर इज़्ज़त बन जाए सब कुछ मिट्टी हो जाता है इज़्ज़त रहती है बनते बनते ढह जाती है दिल की हर तामीर ख़्वाहिश के बहरूप में शायद क़िस्मत रहती है साए लरज़ते रहते हैं शहरों की गलियों में रहते थे इंसान जहाँ अब दहशत रहती है मौसम कोई ख़ुशबू ले कर आते जाते हैं क्या क्या हम को रात गए तक वहशत रहती है ध्यान में मेला सा लगता है बीती यादों का अक्सर उस के ग़म से दिल की सोहबत रहती है फूलों की तख़्ती पर जैसे रंगों की तहरीर लौह-ए-सुख़न पर ऐसे 'अमजद' शोहरत रहती है
Amjad Islam Amjad
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पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है
Amjad Islam Amjad
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भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ जब भी आया सामने वो बे-वफ़ा अच्छा लगा
Amjad Islam Amjad
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औरों का था बयान तो मौज सदा रहे ख़ुद उम्र भर असीर-ए-लब-ए-मुद्दआ' रहे मिस्ल-ए-हबाब बहर-ए-ग़म-ए-हादसात में हम ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-आब-ओ-हवा रहे हम उस से अपनी बात का माँगे अगर जवाब लहरों का पेच-ओ-ख़म वो खड़ा देखता रहे आया तो अपनी आँख भी अपनी न बन सकी हम सोचते थे उस से कभी सामना रहे गुलशन में थे तो रौनक़-ए-रंग-ए-चमन बने जंगल में हम अमानत-ए-बाद-ए-सबा रहे सुर्ख़ी बने तो ख़ून-ए-शहीदाँ का रंग थे रौशन हुए तो मशअ'ल-ए-राह-ए-बक़ा रहे 'अमजद' दर-ए-निगार पे दस्तक ही दीजिए इस बे-कराँ सुकूत में कुछ ग़लग़ला रहे
Amjad Islam Amjad
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कमाल-ए-हुस्न है हुस्न-ए-कमाल से बाहर अज़ल का रंग है जैसे मिसाल से बाहर तो फिर वो कौन है जो मावरा है हर शय से नहीं है कुछ भी यहाँ गर ख़याल से बाहर ये काएनात सरापा जवाब है जिस का वो इक सवाल है फिर भी सवाल से बाहर है याद अहल-ए-वतन यूँँ कि रेग-ए-साहिल पर गिरी हुई कोई मछली हो जाल से बाहर अजीब सिलसिला-ए-रंग है तमन्ना भी हद-ए-उरूज से आगे ज़वाल है बाहर न उस का अंत है कोई न इस्तिआ'रा है ये दास्तान है हिज्र-ओ-विसाल से बाहर दुआ बुज़ुर्गों की रखती है ज़ख़्म उल्फ़त को किसी इलाज किसी इंदिमाल से बाहर बयाँ हो किस तरह वो कैफ़ियत कि है 'अमजद' मिरी तलब से फ़रावाँ मजाल से बाहर
Amjad Islam Amjad
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