ghazalKuch Alfaaz

कमाल-ए-हुस्न है हुस्न-ए-कमाल से बाहर अज़ल का रंग है जैसे मिसाल से बाहर तो फिर वो कौन है जो मावरा है हर शय से नहीं है कुछ भी यहाँ गर ख़याल से बाहर ये काएनात सरापा जवाब है जिस का वो इक सवाल है फिर भी सवाल से बाहर है याद अहल-ए-वतन यूँँ कि रेग-ए-साहिल पर गिरी हुई कोई मछली हो जाल से बाहर अजीब सिलसिला-ए-रंग है तमन्ना भी हद-ए-उरूज से आगे ज़वाल है बाहर न उस का अंत है कोई न इस्तिआ'रा है ये दास्तान है हिज्र-ओ-विसाल से बाहर दुआ बुज़ुर्गों की रखती है ज़ख़्म उल्फ़त को किसी इलाज किसी इंदिमाल से बाहर बयाँ हो किस तरह वो कैफ़ियत कि है 'अमजद' मिरी तलब से फ़रावाँ मजाल से बाहर

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अक़्ल ने अच्छे अच्छों को बहकाया था शुक्र है हम पर कुछ वहशत का साया था तुम ने अपनी गर्दन ऊँची ही रक्खी वरना मैं तो माला ले कर आया था मैं अब तक उस के ही रंग में रंगा हूँ जिस ने सब सेे पहले रंग लगाया था मेरी राय सब सेे पहले ली जाए मैं ने सब सेे पहले धोख़ा खाया था सब को इल्म है फूल और ख़ुश्बू दोनों में सब सेे पहले किस ने हाथ छुड़ाया था इक लड़की ने फिर मुझ को बहकाया है इक लड़की ने अच्छे से समझाया था

Zubair Ali Tabish

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तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के आते जाते हैं कई रंग मेरे चेहरे पर लोग लेते हैं मज़ा ज़िक्र तुम्हारा कर के एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के मुंतज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा कर के

Rahat Indori

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ख़ुशबू के एहसास पे भागे पागल लोग मेरे जैसे सीधे साधे पागल लोग मेरे जैसा ढूँढ़ रहे हो सब्र करो मिल जाएँगे मेरे जैसे पागल लोग दोस्त हमारे कोशिश कर के हार गए पागल को कितना समझाते पागल लोग

Vishal Singh Tabish

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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं

Jawwad Sheikh

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है

Amjad Islam Amjad

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आईनों में अक्स न हों तो हैरत रहती है जैसे ख़ाली आँखों में भी वहशत रहती है हर दम दुनिया के हंगा में घेरे रखते थे जब से तेरे ध्यान लगे हैं फ़ुर्सत रहती है करनी है तो खुल के करो इंकार-ए-वफ़ा की बात बात अधूरी रह जाए तो हसरत रहती है शहर-ए-सुख़न में ऐसा कुछ कर इज़्ज़त बन जाए सब कुछ मिट्टी हो जाता है इज़्ज़त रहती है बनते बनते ढह जाती है दिल की हर तामीर ख़्वाहिश के बहरूप में शायद क़िस्मत रहती है साए लरज़ते रहते हैं शहरों की गलियों में रहते थे इंसान जहाँ अब दहशत रहती है मौसम कोई ख़ुशबू ले कर आते जाते हैं क्या क्या हम को रात गए तक वहशत रहती है ध्यान में मेला सा लगता है बीती यादों का अक्सर उस के ग़म से दिल की सोहबत रहती है फूलों की तख़्ती पर जैसे रंगों की तहरीर लौह-ए-सुख़न पर ऐसे 'अमजद' शोहरत रहती है

Amjad Islam Amjad

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औरों का था बयान तो मौज सदा रहे ख़ुद उम्र भर असीर-ए-लब-ए-मुद्दआ' रहे मिस्ल-ए-हबाब बहर-ए-ग़म-ए-हादसात में हम ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-आब-ओ-हवा रहे हम उस से अपनी बात का माँगे अगर जवाब लहरों का पेच-ओ-ख़म वो खड़ा देखता रहे आया तो अपनी आँख भी अपनी न बन सकी हम सोचते थे उस से कभी सामना रहे गुलशन में थे तो रौनक़-ए-रंग-ए-चमन बने जंगल में हम अमानत-ए-बाद-ए-सबा रहे सुर्ख़ी बने तो ख़ून-ए-शहीदाँ का रंग थे रौशन हुए तो मशअ'ल-ए-राह-ए-बक़ा रहे 'अमजद' दर-ए-निगार पे दस्तक ही दीजिए इस बे-कराँ सुकूत में कुछ ग़लग़ला रहे

Amjad Islam Amjad

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किसी की आँख में ख़ुद को तलाश करना है फिर उस के ब'अद हमें आइनों से डरना है फ़लक की बंद गली के फ़क़ीर हैं तारे! कि घूम फिर के यहीं से उन्हें गुज़रना है जो ज़िंदगी थी मिरी जान! तेरे साथ गई बस अब तो उम्र के नक़्शे में वक़्त भरना है जो तुम चलो तो अभी दो क़दम में कट जाए जो फ़ासला मुझे सदियों में पार करना है तो क्यूँँ न आज यहीं पर क़याम हो जाए कि शब क़रीब है आख़िर कहीं ठहरना है वो मेरा सैल-ए-तलब हो कि तेरी रा'नाई चढ़ा है जो भी समुंदर उसे उतरना है सहर हुई तो सितारों ने मूँद लीं आँखें वो क्या करें कि जिन्हें इंतिज़ार करना है ये ख़्वाब है कि हक़ीक़त ख़बर नहीं 'अमजद' मगर है जीना यहीं पर यहीं पे मरना है

Amjad Islam Amjad

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तुम्हारा हाथ जब मेरे लरज़ते हाथ से छूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे वो मोहकम बे-लचक वा'दा खिलौने की तरह टूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे बहार आई न थी लेकिन हवाओं में नए मौसम की ख़ुश्बू रक़्स करती थी अचानक जब कहा तुम ने मिरे मुँह पर मुझे झूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे वो क्या दिन थे यहीं हम ने बहारों की दुआ की थी किसी ने भी नहीं सोचा चमन वालों ने मिल कर जब ख़ुद अपना ही चमन लूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे लिखा था एक तख़्ती पर कोई भी फूल मत तोड़े मगर आँधी तो अन-पढ़ थी सो जब वो बाग़ से गुज़री कोई उखड़ा कोई टूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे बहुत ही ज़ोर से पीटे हवा के बैन पर सीने हमारे ख़ैर-ख़्वाहों ने कि चाँदी के वरक़ जैसा समय ने जब हमें कूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे न रुत थी आँधियों की ये न मौसम था हवाओं का तो फिर ये क्या हुआ 'अमजद' हर इक कोंपल हुई ज़ख़्मी हुआ मजरूह हर बूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे

Amjad Islam Amjad

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