कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था याद अय्या में कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था बा'द ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त शम्अ'' का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था 'मीर' भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिले सफे आवारगी नहीं लगता कभी-कभी वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी-कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहाँ से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बौसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता तेरे ख़याल से आगे भी एक दुनिया है तेरा ख़याल मुझे सरसरी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता
Tehzeeb Hafi
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तुम सर्वत को पढ़ती हो कितनी अच्छी लड़की हो बात नहीं सुनती हो क्यूँँ ग़ज़लें भी तो सुनती हो क्या रिश्ता है शामों से सूरज की क्या लगती हो लोग नहीं डरते रब से तुम लोगों से डरती हो मैं तो जीता हूँ तुम में तुम क्यूँँ मुझ पे मरती हो आदम और सुधर जाए तुम भी हद ही करती हो किस ने जींस करी ममनूअ' पहनो अच्छी लगती हो
Ali Zaryoun
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बरसों के बा'द देखा इक शख़्स दिलरुबा सा अब ज़ेहन में नहीं है पर नाम था भला सा अबरू खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा अल्फ़ाज़ थे कि जुगनू आवाज़ के सफ़र में बन जाए जंगलों में जिस तरह रास्ता सा ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की नींदों में खुल गया हो जैसे कि रतजगा सा पहले भी लोग आए कितने ही ज़िंदगी में वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा कुछ ये कि मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोए कुछ ज़हर में खुला था अहबाब का दिलासा फिर यूँँ हुआ कि सावन आँखों में आ बसे थे फिर यूँँ हुआ कि जैसे दिल भी था आबला सा अब सच कहें तो यारों हम को ख़बर नहीं थी बन जाएगा क़यामत इक वाक़िआ' ज़रा सा तेवर थे बे-रुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा हम दश्त थे कि दरिया हम ज़हर थे कि अमृत ना-हक़ था ज़ोम हम को जब वो नहीं था प्यासा हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तिफ़ाक़न अपना भी हाल है अब लोगों फ़राज़ का सा
Ahmad Faraz
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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ
Meer Taqi Meer
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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
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नहीं वसवास जी गँवाने के हाए रे ज़ौक़ दिल लगाने के मेरे तग़ईर-ए-हाल पर मत जा इत्तिफ़ाक़ात हैं ज़माने के दम-ए-आख़िर ही क्या न आना था और भी वक़्त थे बहाने के इस कुदूरत को हम समझते हैं ढब हैं ये ख़ाक में मिलाने के बस हैं दो बर्ग-ए-गुल क़फ़स में सबा नहीं भूके हम आब-ओ-दाने के मरने पर बैठे हैं सुनो साहब बंदे हैं अपने जी चलाने के अब गरेबाँ कहाँ कि ऐ नासेह चढ़ गया हाथ उस दिवाने के चश्म-ए-नजम सिपहर झपके है सदक़े उस अँखड़ियाँ लड़ाने के दिल-ओ-दीं होश-ओ-सब्र सब ही गए आगे आगे तुम्हारे आने के कब तू सोता था घर मरे आ कर जागे ताला ग़रीब-ख़ाने के मिज़ा-ए-अबरू-निगह से इस की 'मीर' कुश्ता हैं अपने दिल लगाने के तीर-ओ-तलवार-ओ-सैल यकजा हैं सारे अस्बाब मार जाने के
Meer Taqi Meer
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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
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जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है रूमाल दो दो दिन तक जूँ अब्र तर रहे है आह-ए-सहर की मेरी बर्छी के वसवसे से ख़ुर्शीद के मुँह ऊपर अक्सर सिपर रहे है आगह तो रहिए उस की तर्ज़-ए-रह-ओ-रविश से आने में उस के लेकिन किस को ख़बर रहे है उन रोज़ों इतनी ग़फ़लत अच्छी नहीं इधर से अब इज़्तिराब हम को दो दो पहर रहे है आब-ए-हयात की सी सारी रविश है उस की पर जब वो उठ चले है एक आध मर रहे है तलवार अब लगा है बे-डोल पास रखने ख़ून आज कल किसू का वो शोख़ कर रहे है दर से कभू जो आते देखा है मैं ने उस को तब से उधर ही अक्सर मेरी नज़र रहे है आख़िर कहाँ तलक हम इक रोज़ हो चुकेंगे बरसों से वादा-ए-शब हर सुब्ह पर रहे है 'मीर' अब बहार आई सहरा में चल जुनूँ कर कोई भी फ़स्ल-ए-गुल में नादान घर रहे है
Meer Taqi Meer
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