ख़मोशी साज़ होती जा रही है नज़र आवाज़ होती जा रही है नज़र तेरी जो इक दिल की किरन थी ज़माना-साज़ होती जा रही है नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती बस इक आवाज़ होती जा रही है ख़मोशी जो कभी थी पर्दा-ए-ग़म यही ग़म्माज़ होती जा रही है बदी के सामने नेकी अभी तक सिपर-अंदाज़ होती जा रही है ग़ज़ल 'मुल्ला' तिरे सेहर-ए-बयाँ से अजब ए'जाज़ होती जा रही है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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दुनिया है ये किसी का न इस में क़ुसूर था दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था उस के करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था वर्ना तिरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था तुम दूर जब तलक थे तो नग़्मा भी था फ़ुग़ाँ तुम पास आ गए तो अलम भी सुरूर था उस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था इक दर्स थी किसी की ये फ़नकारी-ए-निगाह कोई न ज़द में था न कोई ज़द से दूर था बस देखने ही में थीं निगाहें किसी की तल्ख़ शीरीं सा इक पयाम भी बैनस्सुतूर था पीते तो हम ने शैख़ को देखा नहीं मगर निकला जो मय-कदे से तो चेहरे पे नूर था 'मुल्ला' का मस्जिदों में तो हम ने सुना न नाम ज़िक्र उस का मय-कदों में मगर दूर दूर था
Anand Narayan Mulla
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छुप के दुनिया से सवाद-ए-दिल-ए-ख़ामोश में आ आ यहाँ तू मिरी तरसी हुई आग़ोश में आ और दुनिया में कहीं तेरा ठिकाना ही नहीं ऐ मिरे दिल की तमन्ना लब-ए-ख़ामोश में आ मय-ए-रंगीं पस-ए-मीना से इशारे कब तक एक दिन साग़र-ए-रिंदान-ए-बला-नोश में आ इश्क़ करता है तो फिर इश्क़ की तौहीन न कर या तो बेहोश न हो हो तो न फिर होश में आ तू बदल दे न कहीं जौहर-ए-इंसाँ का भी रंग ऐ ज़माने के लहू देख न यूँँ जोश में आ देख क्या दाम लगाती है निगाह-ए-'मुल्ला' कभी ऐ ग़ुंचा-ए-तर दस्त-ए-गुल-अफ़रोश में आ
Anand Narayan Mulla
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मिरी बात का जो यक़ीं नहीं मुझे आज़मा के भी देख ले तुझे दिल तो कब का मैं दे चुका उसे ग़म बना के भी देख ले ये तो ठीक है कि तिरी जफ़ा भी इक अता मिरे वास्ते मिरी हसरतों की क़सम तुझे कभी मुस्कुरा के भी देख ले मिरा दिल अलग है बुझा सा कुछ तिरे हुस्न पर भी चमक नहीं कभी एक मरकज़-ए-ज़ीस्त पर उन्हें साथ ला के भी देख ले मिरे शौक़ की हैं वही ज़िदें अभी लब पे है वही इल्तिजा कभी इस जले हुए तूर पर मुझे फिर बुला के भी देख ले न मिटेगा नक़्श-ए-वफ़ा कभी न मिटेगा हाँ न मिटेगा ये किसी और की तो मजाल क्या उसे ख़ुद मिटा के भी देख ले किसी गुल-ए-फ़सुर्दा-ए-बाग़ हूँ मिरे लब हँसी को भुला चुके तुझे ऐ सबा जो न हो यक़ीं मुझे गुदगुदा के भी देख ले मिरे दिल में तू ही है जल्वा-गर तिरा आइना हूँ मैं सर-बसर यूँँही दूर ही से नज़र न कर कभी पास आ के भी देख ले मिरे ज़र्फ़-ए-इश्क़ पे शक न कर मिरे हर्फ़-ए-शौक़ को भूल जा जो यही हिजाब है दरमियाँ ये हिजाब उठा के भी देख ले ये जहान है इसे क्या पड़ी है जो ये सुने तिरी दास्ताँ तुझे फिर भी 'मुल्ला' अगर है ज़िद ग़म-ए-दिल सुना के भी देख ले
Anand Narayan Mulla
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सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले अश्क आँखों में हैं होंटों पे बुका से पहले क़ाफ़िला ग़म का चला बाँग-ए-दरा से पहले हाँ यही दिल जो किसी का है अब आईना-ए-हुस्न वरक़-ए-सादा था उल्फ़त की जिला से पहले इब्तिदा ही से न दे ज़ीस्त मुझे दर्स इस का और भी बाब तो हैं बाब-ए-रज़ा से पहले मैं गिरा ख़ाक पे लेकिन कभी तुम ने सोचा मुझ पे क्या बीत गई लग़्ज़िश-ए-पास पहले अश्क आते तो थे लेकिन ये चमक और तड़प इन में कब थी ग़म-ए-उल्फ़त की जिला से पहले दर-ए-मय-ख़ाना से आती है सदा-ए-साक़ी आज सैराब किए जाएँगे प्यासे पहले राज़-ए-मय-नोशी-ए-'मुल्ला' हुआ इफ़शा वर्ना समझा जाता था वली लग़्ज़िश-ए-पास पहले
Anand Narayan Mulla
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मोहब्बत से भी कार-ए-ज़िंदगी आसाँ नहीं होता बहल जाता है दिल ग़म का मगर दरमाँ नहीं होता कली दिल की खिले अफ़्सोस ये सामाँ नहीं होता घटाएँ घिर के आती हैं मगर बाराँ नहीं होता मोहब्बत के एवज़ में ओ मोहब्बत ढूँडने वाले ये दुनिया है यहाँ ऐसा अरे नादाँ नहीं होता दिल-ए-नाकाम इक तू ही नहीं है सिर्फ़ मुश्किल में उसे इनकार करना भी तो कुछ आसाँ नहीं होता हँसी में ग़म छुपा लेना ये सब कहने की बातें हैं जो ग़म दर-अस्ल ग़म होता है वो पिन्हाँ नहीं होता ज़माने ने ये तख़्ती किश्त-ए-अरमाँ पर लगा दी है गुल इस क्यारी में आता है मगर ख़ंदाँ नहीं होता कहीं क्या तुम से हम अपने दिल-ए-मजबूर का आलम समझ में वज्ह-ए-ग़म आती है और दरमाँ नहीं होता मआल-ए-इख़्तिलाफ़-ए-बाहमी अफ़्सोस क्या कहिए हर इक क़तरे में शोरिश है मगर तूफ़ाँ नहीं होता दयार-ए-इश्क़ है ये ज़र्फ़-ए-दिल की जाँच होती है यहाँ पोशाक से अंदाज़ा-ए-इंसाँ नहीं होता ग़ुरूर-ए-हुस्न तेरी बे-नियाज़ी शान-ए-इस्तिग़ना जभी तक है कि जब तक इश्क़ बे-पायाँ नहीं होता सदा-ए-बाज़गश्त आती है अय्याम-ए-गुज़िश्ता की ये दिल वीरान हो जाने पे भी वीराँ नहीं होता मोहब्बत तो बजा-ए-ख़ुद इक ईमाँ है अरे 'मुल्ला' मोहब्बत करने वाले का कोई ईमाँ नहीं होता
Anand Narayan Mulla
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