छुप के दुनिया से सवाद-ए-दिल-ए-ख़ामोश में आ आ यहाँ तू मिरी तरसी हुई आग़ोश में आ और दुनिया में कहीं तेरा ठिकाना ही नहीं ऐ मिरे दिल की तमन्ना लब-ए-ख़ामोश में आ मय-ए-रंगीं पस-ए-मीना से इशारे कब तक एक दिन साग़र-ए-रिंदान-ए-बला-नोश में आ इश्क़ करता है तो फिर इश्क़ की तौहीन न कर या तो बेहोश न हो हो तो न फिर होश में आ तू बदल दे न कहीं जौहर-ए-इंसाँ का भी रंग ऐ ज़माने के लहू देख न यूँँ जोश में आ देख क्या दाम लगाती है निगाह-ए-'मुल्ला' कभी ऐ ग़ुंचा-ए-तर दस्त-ए-गुल-अफ़रोश में आ
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
More from Anand Narayan Mulla
दुनिया है ये किसी का न इस में क़ुसूर था दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था उस के करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था वर्ना तिरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था तुम दूर जब तलक थे तो नग़्मा भी था फ़ुग़ाँ तुम पास आ गए तो अलम भी सुरूर था उस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था इक दर्स थी किसी की ये फ़नकारी-ए-निगाह कोई न ज़द में था न कोई ज़द से दूर था बस देखने ही में थीं निगाहें किसी की तल्ख़ शीरीं सा इक पयाम भी बैनस्सुतूर था पीते तो हम ने शैख़ को देखा नहीं मगर निकला जो मय-कदे से तो चेहरे पे नूर था 'मुल्ला' का मस्जिदों में तो हम ने सुना न नाम ज़िक्र उस का मय-कदों में मगर दूर दूर था
Anand Narayan Mulla
0 likes
क्यूँँ न हो ज़िक्र मोहब्बत का मरे नाम के साथ उम्र काटी है इसी दर्द-ए-दिल-आराम के साथ मुझ को दुनिया से नहीं अपनी तबाही का गिला मैं ने ख़ुद साज़ किया गर्दिश-ए-अय्याम के साथ अब वही ज़ीस्त में है ये मिरे दिल का आलम जैसे कुछ छूटता जाता है हर इक गाम के साथ तुझ से शिकवा नहीं साक़ी तिरी सहबा ने मगर दुश्मनी कोई निकाली है मिरे जाम के साथ जो करे फ़िक्र-ए-रिहाई वही दुश्मन ठहरे उन्स हो जाए न ताइर को किसी दाम के साथ ज़ीस्त के दर्द का एहसास कभी मिट न सका सिन ख़ुशी के भी कटे इक ग़म-ए-बे-नाम के साथ मन-ए-तक़्सीर कहूँ दावत-ए-तक़्सीर कहूँ निगह-ए-नर्म भी है गर्मी-ए-इल्ज़ाम के साथ अपनी इस आज की ताक़त पे न यूँँ इतराओ मेहर उट्ठा था हर इक सुब्ह-ए-शब-अंजाम के साथ मैं तुझे भूल चुका हूँ मगर अब भी ऐ दोस्त आती जाती है निगाहों में चमक शाम के साथ अब भी काफ़ी है ये हर शोर पे छाने के लिए कोई उल्फ़त की अज़ाँ दे तो तिरे नाम के साथ आ गया ख़त्म पे सय्याद तिरा दौर-ए-फ़ुसूँ अब तो दाना भी नहीं है क़फ़स-ओ-दाम के साथ काख़-ओ-ऐवाँ यही गुज़रे हुए दौरों के न हों गर्द सी आई है कुछ दामन-ए-अय्याम के साथ मैं तिरा हो न सका फिर भी मोहब्बत मैं ने जब भी दुनिया को पुकारा तो तिरे नाम के साथ ख़ुल्द उजड़ी है तो अब अपने फ़रिश्तों से बसा हम से क्या हम तो निकाले गए इल्ज़ाम के साथ हुजरा-ए-ख़ुल्द है हूर-ए-शरर-अंदाम नहीं साक़िया आतिश-ए-रंगीं भी ज़रा जाम के साथ ज़िक्र-ए-'मुल्ला' भी अब आता तो है महफ़िल में मगर फीकी ता'रीफ़ में लिपटे हुए दुश्नाम के साथ मेरी कोशिश है कि शे'रों में समो दूँ 'मुल्ला' सुब्ह का होश भी दीवानगी-ए-शाम के साथ दो किनारों के हूँ माबैन में इक पल 'मुल्ला' रखता जाता हूँ सुतूँ एक हर इक गाम के साथ
Anand Narayan Mulla
0 likes
ख़मोशी साज़ होती जा रही है नज़र आवाज़ होती जा रही है नज़र तेरी जो इक दिल की किरन थी ज़माना-साज़ होती जा रही है नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती बस इक आवाज़ होती जा रही है ख़मोशी जो कभी थी पर्दा-ए-ग़म यही ग़म्माज़ होती जा रही है बदी के सामने नेकी अभी तक सिपर-अंदाज़ होती जा रही है ग़ज़ल 'मुल्ला' तिरे सेहर-ए-बयाँ से अजब ए'जाज़ होती जा रही है
Anand Narayan Mulla
0 likes
सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले अश्क आँखों में हैं होंटों पे बुका से पहले क़ाफ़िला ग़म का चला बाँग-ए-दरा से पहले हाँ यही दिल जो किसी का है अब आईना-ए-हुस्न वरक़-ए-सादा था उल्फ़त की जिला से पहले इब्तिदा ही से न दे ज़ीस्त मुझे दर्स इस का और भी बाब तो हैं बाब-ए-रज़ा से पहले मैं गिरा ख़ाक पे लेकिन कभी तुम ने सोचा मुझ पे क्या बीत गई लग़्ज़िश-ए-पास पहले अश्क आते तो थे लेकिन ये चमक और तड़प इन में कब थी ग़म-ए-उल्फ़त की जिला से पहले दर-ए-मय-ख़ाना से आती है सदा-ए-साक़ी आज सैराब किए जाएँगे प्यासे पहले राज़-ए-मय-नोशी-ए-'मुल्ला' हुआ इफ़शा वर्ना समझा जाता था वली लग़्ज़िश-ए-पास पहले
Anand Narayan Mulla
0 likes
मोहब्बत से भी कार-ए-ज़िंदगी आसाँ नहीं होता बहल जाता है दिल ग़म का मगर दरमाँ नहीं होता कली दिल की खिले अफ़्सोस ये सामाँ नहीं होता घटाएँ घिर के आती हैं मगर बाराँ नहीं होता मोहब्बत के एवज़ में ओ मोहब्बत ढूँडने वाले ये दुनिया है यहाँ ऐसा अरे नादाँ नहीं होता दिल-ए-नाकाम इक तू ही नहीं है सिर्फ़ मुश्किल में उसे इनकार करना भी तो कुछ आसाँ नहीं होता हँसी में ग़म छुपा लेना ये सब कहने की बातें हैं जो ग़म दर-अस्ल ग़म होता है वो पिन्हाँ नहीं होता ज़माने ने ये तख़्ती किश्त-ए-अरमाँ पर लगा दी है गुल इस क्यारी में आता है मगर ख़ंदाँ नहीं होता कहीं क्या तुम से हम अपने दिल-ए-मजबूर का आलम समझ में वज्ह-ए-ग़म आती है और दरमाँ नहीं होता मआल-ए-इख़्तिलाफ़-ए-बाहमी अफ़्सोस क्या कहिए हर इक क़तरे में शोरिश है मगर तूफ़ाँ नहीं होता दयार-ए-इश्क़ है ये ज़र्फ़-ए-दिल की जाँच होती है यहाँ पोशाक से अंदाज़ा-ए-इंसाँ नहीं होता ग़ुरूर-ए-हुस्न तेरी बे-नियाज़ी शान-ए-इस्तिग़ना जभी तक है कि जब तक इश्क़ बे-पायाँ नहीं होता सदा-ए-बाज़गश्त आती है अय्याम-ए-गुज़िश्ता की ये दिल वीरान हो जाने पे भी वीराँ नहीं होता मोहब्बत तो बजा-ए-ख़ुद इक ईमाँ है अरे 'मुल्ला' मोहब्बत करने वाले का कोई ईमाँ नहीं होता
Anand Narayan Mulla
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Anand Narayan Mulla.
Similar Moods
More moods that pair well with Anand Narayan Mulla's ghazal.







