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मिरी बात का जो यक़ीं नहीं मुझे आज़मा के भी देख ले तुझे दिल तो कब का मैं दे चुका उसे ग़म बना के भी देख ले ये तो ठीक है कि तिरी जफ़ा भी इक अता मिरे वास्ते मिरी हसरतों की क़सम तुझे कभी मुस्कुरा के भी देख ले मिरा दिल अलग है बुझा सा कुछ तिरे हुस्न पर भी चमक नहीं कभी एक मरकज़-ए-ज़ीस्त पर उन्हें साथ ला के भी देख ले मिरे शौक़ की हैं वही ज़िदें अभी लब पे है वही इल्तिजा कभी इस जले हुए तूर पर मुझे फिर बुला के भी देख ले न मिटेगा नक़्श-ए-वफ़ा कभी न मिटेगा हाँ न मिटेगा ये किसी और की तो मजाल क्या उसे ख़ुद मिटा के भी देख ले किसी गुल-ए-फ़सुर्दा-ए-बाग़ हूँ मिरे लब हँसी को भुला चुके तुझे ऐ सबा जो न हो यक़ीं मुझे गुदगुदा के भी देख ले मिरे दिल में तू ही है जल्वा-गर तिरा आइना हूँ मैं सर-बसर यूँँही दूर ही से नज़र न कर कभी पास आ के भी देख ले मिरे ज़र्फ़-ए-इश्क़ पे शक न कर मिरे हर्फ़-ए-शौक़ को भूल जा जो यही हिजाब है दरमियाँ ये हिजाब उठा के भी देख ले ये जहान है इसे क्या पड़ी है जो ये सुने तिरी दास्ताँ तुझे फिर भी 'मुल्ला' अगर है ज़िद ग़म-ए-दिल सुना के भी देख ले

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले अश्क आँखों में हैं होंटों पे बुका से पहले क़ाफ़िला ग़म का चला बाँग-ए-दरा से पहले हाँ यही दिल जो किसी का है अब आईना-ए-हुस्न वरक़-ए-सादा था उल्फ़त की जिला से पहले इब्तिदा ही से न दे ज़ीस्त मुझे दर्स इस का और भी बाब तो हैं बाब-ए-रज़ा से पहले मैं गिरा ख़ाक पे लेकिन कभी तुम ने सोचा मुझ पे क्या बीत गई लग़्ज़िश-ए-पास पहले अश्क आते तो थे लेकिन ये चमक और तड़प इन में कब थी ग़म-ए-उल्फ़त की जिला से पहले दर-ए-मय-ख़ाना से आती है सदा-ए-साक़ी आज सैराब किए जाएँगे प्यासे पहले राज़-ए-मय-नोशी-ए-'मुल्ला' हुआ इफ़शा वर्ना समझा जाता था वली लग़्ज़िश-ए-पास पहले

Anand Narayan Mulla

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छुप के दुनिया से सवाद-ए-दिल-ए-ख़ामोश में आ आ यहाँ तू मिरी तरसी हुई आग़ोश में आ और दुनिया में कहीं तेरा ठिकाना ही नहीं ऐ मिरे दिल की तमन्ना लब-ए-ख़ामोश में आ मय-ए-रंगीं पस-ए-मीना से इशारे कब तक एक दिन साग़र-ए-रिंदान-ए-बला-नोश में आ इश्क़ करता है तो फिर इश्क़ की तौहीन न कर या तो बेहोश न हो हो तो न फिर होश में आ तू बदल दे न कहीं जौहर-ए-इंसाँ का भी रंग ऐ ज़माने के लहू देख न यूँँ जोश में आ देख क्या दाम लगाती है निगाह-ए-'मुल्ला' कभी ऐ ग़ुंचा-ए-तर दस्त-ए-गुल-अफ़रोश में आ

Anand Narayan Mulla

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दुनिया है ये किसी का न इस में क़ुसूर था दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था उस के करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था वर्ना तिरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था तुम दूर जब तलक थे तो नग़्मा भी था फ़ुग़ाँ तुम पास आ गए तो अलम भी सुरूर था उस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था इक दर्स थी किसी की ये फ़नकारी-ए-निगाह कोई न ज़द में था न कोई ज़द से दूर था बस देखने ही में थीं निगाहें किसी की तल्ख़ शीरीं सा इक पयाम भी बैनस्सुतूर था पीते तो हम ने शैख़ को देखा नहीं मगर निकला जो मय-कदे से तो चेहरे पे नूर था 'मुल्ला' का मस्जिदों में तो हम ने सुना न नाम ज़िक्र उस का मय-कदों में मगर दूर दूर था

Anand Narayan Mulla

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क्यूँँ न हो ज़िक्र मोहब्बत का मरे नाम के साथ उम्र काटी है इसी दर्द-ए-दिल-आराम के साथ मुझ को दुनिया से नहीं अपनी तबाही का गिला मैं ने ख़ुद साज़ किया गर्दिश-ए-अय्याम के साथ अब वही ज़ीस्त में है ये मिरे दिल का आलम जैसे कुछ छूटता जाता है हर इक गाम के साथ तुझ से शिकवा नहीं साक़ी तिरी सहबा ने मगर दुश्मनी कोई निकाली है मिरे जाम के साथ जो करे फ़िक्र-ए-रिहाई वही दुश्मन ठहरे उन्स हो जाए न ताइर को किसी दाम के साथ ज़ीस्त के दर्द का एहसास कभी मिट न सका सिन ख़ुशी के भी कटे इक ग़म-ए-बे-नाम के साथ मन-ए-तक़्सीर कहूँ दावत-ए-तक़्सीर कहूँ निगह-ए-नर्म भी है गर्मी-ए-इल्ज़ाम के साथ अपनी इस आज की ताक़त पे न यूँँ इतराओ मेहर उट्ठा था हर इक सुब्ह-ए-शब-अंजाम के साथ मैं तुझे भूल चुका हूँ मगर अब भी ऐ दोस्त आती जाती है निगाहों में चमक शाम के साथ अब भी काफ़ी है ये हर शोर पे छाने के लिए कोई उल्फ़त की अज़ाँ दे तो तिरे नाम के साथ आ गया ख़त्म पे सय्याद तिरा दौर-ए-फ़ुसूँ अब तो दाना भी नहीं है क़फ़स-ओ-दाम के साथ काख़-ओ-ऐवाँ यही गुज़रे हुए दौरों के न हों गर्द सी आई है कुछ दामन-ए-अय्याम के साथ मैं तिरा हो न सका फिर भी मोहब्बत मैं ने जब भी दुनिया को पुकारा तो तिरे नाम के साथ ख़ुल्द उजड़ी है तो अब अपने फ़रिश्तों से बसा हम से क्या हम तो निकाले गए इल्ज़ाम के साथ हुजरा-ए-ख़ुल्द है हूर-ए-शरर-अंदाम नहीं साक़िया आतिश-ए-रंगीं भी ज़रा जाम के साथ ज़िक्र-ए-'मुल्ला' भी अब आता तो है महफ़िल में मगर फीकी ता'रीफ़ में लिपटे हुए दुश्नाम के साथ मेरी कोशिश है कि शे'रों में समो दूँ 'मुल्ला' सुब्ह का होश भी दीवानगी-ए-शाम के साथ दो किनारों के हूँ माबैन में इक पल 'मुल्ला' रखता जाता हूँ सुतूँ एक हर इक गाम के साथ

Anand Narayan Mulla

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ख़मोशी साज़ होती जा रही है नज़र आवाज़ होती जा रही है नज़र तेरी जो इक दिल की किरन थी ज़माना-साज़ होती जा रही है नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती बस इक आवाज़ होती जा रही है ख़मोशी जो कभी थी पर्दा-ए-ग़म यही ग़म्माज़ होती जा रही है बदी के सामने नेकी अभी तक सिपर-अंदाज़ होती जा रही है ग़ज़ल 'मुल्ला' तिरे सेहर-ए-बयाँ से अजब ए'जाज़ होती जा रही है

Anand Narayan Mulla

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