ख़ुद को मुर्शिद मान ले प्यारे क्यूँँ और क्या का भेद समझ अपनी सूरत तकता रह और फिर कैसा का भेद समझ तुझ से बढ़ कर दश्त नहीं है तुझ से बढ़ कर गोर नहीं इस जंगल में आ उस गोर में रह मौला का भेद समझ जानने वाले मानने वालों से अफ़ज़ल है ध्यान रहे मजनूँ मत बन होश में रह और फिर लैला का भेद समझ पानी सर से ऊपर चढ़ने दे साँसों की माला फिर दो जान होता मैं बैठ और दिल दरिया का भेद समझ हर इक़रार से पहले इक इनकार की हिफ़ाज़त होती है अल्लाह के बंदे अल्लाह से पहले ला का भेद समझ
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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तुम्हारे चेहरे पे ध्यान ऐसे टिका हुआ है तमाम सम्तों को एक जानिब रखा हुआ है हरे दरख़्तों से बेलें कैसे लिपट रही हैं ज़मीन पर आसमान कैसे झुका हुआ है वो एक लड़की जो मर रही है हया के मारे वो एक लड़का जो देखने पर तुला हुआ है शब-ए-विसाल उस का सुर्ख़ आँचल मुसल्ला कर के बदन-वज़ीफ़े का विर्द जारी रखा हुआ है तू सिर्फ़ वहशत के दम पे दिल-दश्त में ना आना ये इस्म भी राएगाँ है मेरा पढ़ा हुआ है फिर उस के बा'द उस ने मेरी आँखें भी गीली कर दीं मैं पूछ बैठा था तेरी आँखों को क्या हुआ है ये वक़्त-ए-मग़रिब से क़ब्ल का आफ़्ताब 'सरमद' ये उस के हाथों में कैसे कैसे लगा हुआ है
Naeem Sarmad
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सुर्ख़ मिट्टी को हवाओं में उड़ाते हुए हम अपनी आमद के लिए दश्त सजाते हुए हम तुझ तबस्सुम की मोहब्बत में हुए हैं बर्बाद मुस्कुराएँगे तिरा सोग मनाते हुए हम ला-मकानी में हमें छोड़ के जाता हुआ तू दश्त-ए-इम्काँ से तुझे ढूँड के लाते हुए हम ऐ ख़ुदा तू ही बता कैसे करेंगे इनकार आलम-ए-हू में तुझे हाथ लगाते हुए हम रक़्स करते हैं तो मिट्टी तो उड़ेगी प्यारे उन को लगते हैं करामात दिखाते हुए हम अपने होने से भी इनकार किए जाते हैं तेरे होने का यक़ीं ख़ुद को दिलाते हुए हम अब ऐ वहशत में गुँधी ख़ाक रखी चाक पे और अपने होने के लिए चाक घुमाते हुए हम हालत-ए-वज्द के हालात बता बात हो तो हालत-ए-हाल में तफ़रीह उठाते हुए हम ख़ामुशी शोर हैं और शोर बला का 'सरमद' तुम ने देखे हैं कहीं शोर मचाते हुए हम
Naeem Sarmad
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अब के मौसम में तिरा शहर वो कैसा होगा मेरी मर्ज़ी के बिना चाँद निकलता होगा कैसे कह दूँ कि मुझे किस ने हैं बर्बाद किया अपना आया हो मिरी बात से रुख़्सत होगा ये कोई बात है जो तुझ को बताई जाए शाम के वक़्त उदासी का सबब क्या होगा अब की सर्दी में कहाँ है वो अलाव सीना अब की सर्दी में मुझे ख़ुद को जलाना होगा तुझ से मिलने की कई दिन से तमन्ना है मुझे तू कभी जिस्म से बाहर तो निकलता होगा
Naeem Sarmad
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