ghazalKuch Alfaaz

तुम्हारे चेहरे पे ध्यान ऐसे टिका हुआ है तमाम सम्तों को एक जानिब रखा हुआ है हरे दरख़्तों से बेलें कैसे लिपट रही हैं ज़मीन पर आसमान कैसे झुका हुआ है वो एक लड़की जो मर रही है हया के मारे वो एक लड़का जो देखने पर तुला हुआ है शब-ए-विसाल उस का सुर्ख़ आँचल मुसल्ला कर के बदन-वज़ीफ़े का विर्द जारी रखा हुआ है तू सिर्फ़ वहशत के दम पे दिल-दश्त में ना आना ये इस्म भी राएगाँ है मेरा पढ़ा हुआ है फिर उस के बा'द उस ने मेरी आँखें भी गीली कर दीं मैं पूछ बैठा था तेरी आँखों को क्या हुआ है ये वक़्त-ए-मग़रिब से क़ब्ल का आफ़्ताब 'सरमद' ये उस के हाथों में कैसे कैसे लगा हुआ है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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ख़ुद को मुर्शिद मान ले प्यारे क्यूँँ और क्या का भेद समझ अपनी सूरत तकता रह और फिर कैसा का भेद समझ तुझ से बढ़ कर दश्त नहीं है तुझ से बढ़ कर गोर नहीं इस जंगल में आ उस गोर में रह मौला का भेद समझ जानने वाले मानने वालों से अफ़ज़ल है ध्यान रहे मजनूँ मत बन होश में रह और फिर लैला का भेद समझ पानी सर से ऊपर चढ़ने दे साँसों की माला फिर दो जान होता मैं बैठ और दिल दरिया का भेद समझ हर इक़रार से पहले इक इनकार की हिफ़ाज़त होती है अल्लाह के बंदे अल्लाह से पहले ला का भेद समझ

Naeem Sarmad

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सुर्ख़ मिट्टी को हवाओं में उड़ाते हुए हम अपनी आमद के लिए दश्त सजाते हुए हम तुझ तबस्सुम की मोहब्बत में हुए हैं बर्बाद मुस्कुराएँगे तिरा सोग मनाते हुए हम ला-मकानी में हमें छोड़ के जाता हुआ तू दश्त-ए-इम्काँ से तुझे ढूँड के लाते हुए हम ऐ ख़ुदा तू ही बता कैसे करेंगे इनकार आलम-ए-हू में तुझे हाथ लगाते हुए हम रक़्स करते हैं तो मिट्टी तो उड़ेगी प्यारे उन को लगते हैं करामात दिखाते हुए हम अपने होने से भी इनकार किए जाते हैं तेरे होने का यक़ीं ख़ुद को दिलाते हुए हम अब ऐ वहशत में गुँधी ख़ाक रखी चाक पे और अपने होने के लिए चाक घुमाते हुए हम हालत-ए-वज्द के हालात बता बात हो तो हालत-ए-हाल में तफ़रीह उठाते हुए हम ख़ामुशी शोर हैं और शोर बला का 'सरमद' तुम ने देखे हैं कहीं शोर मचाते हुए हम

Naeem Sarmad

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अब के मौसम में तिरा शहर वो कैसा होगा मेरी मर्ज़ी के बिना चाँद निकलता होगा कैसे कह दूँ कि मुझे किस ने हैं बर्बाद किया अपना आया हो मिरी बात से रुख़्सत होगा ये कोई बात है जो तुझ को बताई जाए शाम के वक़्त उदासी का सबब क्या होगा अब की सर्दी में कहाँ है वो अलाव सीना अब की सर्दी में मुझे ख़ुद को जलाना होगा तुझ से मिलने की कई दिन से तमन्ना है मुझे तू कभी जिस्म से बाहर तो निकलता होगा

Naeem Sarmad

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