ghazalKuch Alfaaz

khula hai jhuut ka bazar aao sach bolen na ho bala se kharidar aao sach bolen sukut chhaya hai insaniyat ki qadron par yahi hai mauqa-e-izhar aao sach bolen hamen gavah banaya hai vaqt ne apna ba-nam-e-azmat-e-kirdar aao sach bolen suna hai vaqt ka hakim bada hi munsif hai pukar kar sar-e-darbar aao sach bolen tamam shahr men kya ek bhi nahin mansur kahenge kya rasan-o-dar aao sach bolen baja ki khu-e-vafa ek bhi hasin men nahin kahan ke ham bhi vafadar aao sach bolen jo vasf ham men nahin kyuun karen kisi men talash agar zamir hai bedar aao sach bolen chhupae se kahin chhupte hain daaghh chehre ke nazar hai aina-bardar aao sach bolen 'qatil' jin pe sada pattharon ko pyaar aaya kidhar gae vo gunahgar aao sach bolen khula hai jhut ka bazar aao sach bolen na ho bala se kharidar aao sach bolen sukut chhaya hai insaniyat ki qadron par yahi hai mauqa-e-izhaar aao sach bolen hamein gawah banaya hai waqt ne apna ba-nam-e-azmat-e-kirdar aao sach bolen suna hai waqt ka hakim bada hi munsif hai pukar kar sar-e-darbar aao sach bolen tamam shahr mein kya ek bhi nahin mansur kahenge kya rasan-o-dar aao sach bolen baja ki khu-e-wafa ek bhi hasin mein nahin kahan ke hum bhi wafadar aao sach bolen jo wasf hum mein nahin kyun karen kisi mein talash agar zamir hai bedar aao sach bolen chhupae se kahin chhupte hain dagh chehre ke nazar hai aaina-bardar aao sach bolen 'qatil' jin pe sada pattharon ko pyar aaya kidhar gae wo gunahgar aao sach bolen

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तिरे आँचल का रंग तेरी आँखों की चमक है या सितारों की ज़िया रात का है घुप अँधेरा या तिरे काजल का रंग धड़कनों के ताल पर वो हाल अपने दिल का है जैसे गोरी के थिरकते पाँव में पायल का रंग फेंकना तुम सोच कर लफ़्ज़ों का ये कड़वा गुलाल फैल जाता है कभी सदियों पे भी इक पल का रंग आह ये रंगीन मौसम ख़ून की बरसात का छा रहा है अक़्ल पर जज़्बात की हलचल का रंग अब तो शबनम का हर इक मोती है कंकर की तरह हाँ उसी गुलशन पे छाया था कभी मख़मल का रंग फिर रहे हैं लोग हाथों में लिए ख़ंजर खुले कूचे कूचे में अब आता है नज़र मक़्तल का रंग चार जानिब जिस की रा'नाई के चर्चे हैं 'क़तील' जाने कब देखेंगे हम उस आने वाली कल का रंग

Qateel Shifai

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अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़िरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आए मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ

Qateel Shifai

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खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँँ करें किसी में तलाश अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें

Qateel Shifai

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राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँँ ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी 'ग़ालिब' से 'क़तील' हज़रत 'ज़ौक़' तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ

Qateel Shifai

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अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझ को मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझ से बचा कर दामन मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझ को तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझ को मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मा'नी ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को मैं समुंदर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोता-ज़न भी कोई भी नाम मिरा ले के बुला ले मुझ को तू ने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी ख़ुद-परस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझ को बाँध कर संग-ए-वफ़ा कर दिया तू ने ग़र्क़ाब कौन ऐसा है जो अब ढूंढ़ निकाले मुझ को ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन दामन कर दिया तू ने अगर मेरे हवाले मुझ को मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामां प्यारे तू दबे-पांव कभी आ के चुरा ले मुझ को कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ जितना जी चाहे तिरा आज सता ले मुझ को वा'दा फिर वा'दा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ 'क़तील' शर्त ये है कोई बाँहों में संभाले मुझ को

Qateel Shifai

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