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अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझ को मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझ से बचा कर दामन मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझ को तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझ को मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मा'नी ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को मैं समुंदर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोता-ज़न भी कोई भी नाम मिरा ले के बुला ले मुझ को तू ने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी ख़ुद-परस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझ को बाँध कर संग-ए-वफ़ा कर दिया तू ने ग़र्क़ाब कौन ऐसा है जो अब ढूंढ़ निकाले मुझ को ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन दामन कर दिया तू ने अगर मेरे हवाले मुझ को मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामां प्यारे तू दबे-पांव कभी आ के चुरा ले मुझ को कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ जितना जी चाहे तिरा आज सता ले मुझ को वा'दा फिर वा'दा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ 'क़तील' शर्त ये है कोई बाँहों में संभाले मुझ को

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़िरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आए मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ

Qateel Shifai

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खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँँ करें किसी में तलाश अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें

Qateel Shifai

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तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तिरे आँचल का रंग तेरी आँखों की चमक है या सितारों की ज़िया रात का है घुप अँधेरा या तिरे काजल का रंग धड़कनों के ताल पर वो हाल अपने दिल का है जैसे गोरी के थिरकते पाँव में पायल का रंग फेंकना तुम सोच कर लफ़्ज़ों का ये कड़वा गुलाल फैल जाता है कभी सदियों पे भी इक पल का रंग आह ये रंगीन मौसम ख़ून की बरसात का छा रहा है अक़्ल पर जज़्बात की हलचल का रंग अब तो शबनम का हर इक मोती है कंकर की तरह हाँ उसी गुलशन पे छाया था कभी मख़मल का रंग फिर रहे हैं लोग हाथों में लिए ख़ंजर खुले कूचे कूचे में अब आता है नज़र मक़्तल का रंग चार जानिब जिस की रा'नाई के चर्चे हैं 'क़तील' जाने कब देखेंगे हम उस आने वाली कल का रंग

Qateel Shifai

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राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँँ ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी 'ग़ालिब' से 'क़तील' हज़रत 'ज़ौक़' तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ

Qateel Shifai

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किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह वो आश्ना भी मिला हम से अजनबी की तरह किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह बढ़ा के प्यास मिरी उस ने हाथ छोड़ दिया वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल-लगी की तरह सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना क़ुबूल हम ने किए जिस के ग़म ख़ुशी की तरह कभी न सोचा था हम ने 'क़तील' उस के लिए करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह

Qateel Shifai

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