ghazalKuch Alfaaz

ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

Kumar Vishwas

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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ये शो'ले आज़माना जानते हैं सो हम दामन बचाना जानते हैं तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं खनकती नुक़रई दिलकश हँसी में हम अपना ग़म छुपाना जानते हैं बुलाना ही नहीं पड़ता है 'अंबर' ये ग़म अपना ठिकाना जानते हैं

Ambreen Haseeb Ambar

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मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से जो मुझे भूल गया इस क़दर आसानी से ख़ुद से घबरा के यही कहती हूँ औरों की तरह ख़ौफ़ आता है मुझे शहर की वीरानी से अब किसी और सलीक़े से सताए दुनिया जी बदलने लगा असबाब-ए-परेशानी से तन को ढाँपे हुए फिरते हैं सभी लोग यहाँ शर्म आती है किसे सोच की उर्यानी से ऐ फ़लक छोड़ दे बेयार-ओ-मददगार हमें दम घुटा जाता है अब तेरी निगहबानी से मैं उसे ख़्वाब समझ सकती हूँ लेकिन 'अंबर' लम्स जाता नहीं उस का मिरी पेशानी से

Ambreen Haseeb Ambar

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मैं ने सोचा है रात-भर तुम को काश हो जाए ये ख़बर तुम को ज़िंदगी में कभी किसी को भी मैं ने चाहा नहीं मगर तुम को जानती हूँ कि तुम नहीं मौजूद ढूँढती है मगर नज़र तुम को तुम भी अफ़्सोस राह-रौ निकले मैं तो समझी थी हम-सफ़र तुम को मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को

Ambreen Haseeb Ambar

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वो मसीहा न बना हम ने भी ख़्वाहिश नहीं की अपनी शर्तों पे जिए उस से गुज़ारिश नहीं की उस ने इक रोज़ किया हम से अचानक वो सवाल धड़कनें थम सी गईं वक़्त ने जुम्बिश नहीं की किस लिए बुझने लगे अव्वल-ए-शब सारे चराग़ आँधियों ने भी अगरचे कोई साज़िश नहीं की अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जवाब होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की उस ने ज़ाहिर न किया अपना पशेमाँ होना हम भी अंजान रहे हम ने भी पुर्सिश नहीं की

Ambreen Haseeb Ambar

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ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे यूँँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे

Ambreen Haseeb Ambar

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