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मैं ने सोचा है रात-भर तुम को काश हो जाए ये ख़बर तुम को ज़िंदगी में कभी किसी को भी मैं ने चाहा नहीं मगर तुम को जानती हूँ कि तुम नहीं मौजूद ढूँढती है मगर नज़र तुम को तुम भी अफ़्सोस राह-रौ निकले मैं तो समझी थी हम-सफ़र तुम को मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi

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ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया

Ambreen Haseeb Ambar

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ये शो'ले आज़माना जानते हैं सो हम दामन बचाना जानते हैं तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं खनकती नुक़रई दिलकश हँसी में हम अपना ग़म छुपाना जानते हैं बुलाना ही नहीं पड़ता है 'अंबर' ये ग़म अपना ठिकाना जानते हैं

Ambreen Haseeb Ambar

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वो मसीहा न बना हम ने भी ख़्वाहिश नहीं की अपनी शर्तों पे जिए उस से गुज़ारिश नहीं की उस ने इक रोज़ किया हम से अचानक वो सवाल धड़कनें थम सी गईं वक़्त ने जुम्बिश नहीं की किस लिए बुझने लगे अव्वल-ए-शब सारे चराग़ आँधियों ने भी अगरचे कोई साज़िश नहीं की अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जवाब होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की उस ने ज़ाहिर न किया अपना पशेमाँ होना हम भी अंजान रहे हम ने भी पुर्सिश नहीं की

Ambreen Haseeb Ambar

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मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से जो मुझे भूल गया इस क़दर आसानी से ख़ुद से घबरा के यही कहती हूँ औरों की तरह ख़ौफ़ आता है मुझे शहर की वीरानी से अब किसी और सलीक़े से सताए दुनिया जी बदलने लगा असबाब-ए-परेशानी से तन को ढाँपे हुए फिरते हैं सभी लोग यहाँ शर्म आती है किसे सोच की उर्यानी से ऐ फ़लक छोड़ दे बेयार-ओ-मददगार हमें दम घुटा जाता है अब तेरी निगहबानी से मैं उसे ख़्वाब समझ सकती हूँ लेकिन 'अंबर' लम्स जाता नहीं उस का मिरी पेशानी से

Ambreen Haseeb Ambar

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ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे यूँँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे

Ambreen Haseeb Ambar

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