ghazalKuch Alfaaz

ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे यूँँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तुम्हारा क्या है तुम्हें सिर्फ़ ज्ञान देना है हमारी सोचो हमें इम्तिहान देना है गुलाब भी हैं गुलाबों में ख़ार भी हैं बता निशानी देनी है या फिर निशान देना है तेरा सवाल मेरी जान का सवाल है और जवाब देने से आसान जान देना है उन्होंने अपने मुताबिक़ सज़ा सुना दी है हमें सज़ा के मुताबिक़ बयान देना है ये बेज़ुबानों की महफ़िल है दोस्त याद रहे यहाँ ख़मोशी का मतलब ज़बान देना है

Charagh Sharma

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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

Tehzeeb Hafi

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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

Umair Najmi

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ये शो'ले आज़माना जानते हैं सो हम दामन बचाना जानते हैं तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं खनकती नुक़रई दिलकश हँसी में हम अपना ग़म छुपाना जानते हैं बुलाना ही नहीं पड़ता है 'अंबर' ये ग़म अपना ठिकाना जानते हैं

Ambreen Haseeb Ambar

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तुम्हारा जो सहारा हो गया है भँवर भी अब किनारा हो गया है मोहब्बत में भला क्या और होता मिरा ये दिल तुम्हारा हो गया है तुम्हारी याद से है वो चराग़ाँ की आँसू भी सितारा हो गया है अजब है मौसम-ए-बे-इख़्तियारी की जब से वो हमारा हो गया इक अन-जानी ख़ुशी के आसरे में हमें हर ग़म गवारा हो गया है हमें कब रास आ सकती थी दुनिया ग़नीमत है गुज़ारा हो गया है जिन्हें रहता था ज़ो'म-ए-दिल-फ़रोशी उन्हें अब के ख़सारा हो गया है

Ambreen Haseeb Ambar

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मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से जो मुझे भूल गया इस क़दर आसानी से ख़ुद से घबरा के यही कहती हूँ औरों की तरह ख़ौफ़ आता है मुझे शहर की वीरानी से अब किसी और सलीक़े से सताए दुनिया जी बदलने लगा असबाब-ए-परेशानी से तन को ढाँपे हुए फिरते हैं सभी लोग यहाँ शर्म आती है किसे सोच की उर्यानी से ऐ फ़लक छोड़ दे बेयार-ओ-मददगार हमें दम घुटा जाता है अब तेरी निगहबानी से मैं उसे ख़्वाब समझ सकती हूँ लेकिन 'अंबर' लम्स जाता नहीं उस का मिरी पेशानी से

Ambreen Haseeb Ambar

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मैं ने सोचा है रात-भर तुम को काश हो जाए ये ख़बर तुम को ज़िंदगी में कभी किसी को भी मैं ने चाहा नहीं मगर तुम को जानती हूँ कि तुम नहीं मौजूद ढूँढती है मगर नज़र तुम को तुम भी अफ़्सोस राह-रौ निकले मैं तो समझी थी हम-सफ़र तुम को मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को

Ambreen Haseeb Ambar

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ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया

Ambreen Haseeb Ambar

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