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तुम्हारा जो सहारा हो गया है भँवर भी अब किनारा हो गया है मोहब्बत में भला क्या और होता मिरा ये दिल तुम्हारा हो गया है तुम्हारी याद से है वो चराग़ाँ की आँसू भी सितारा हो गया है अजब है मौसम-ए-बे-इख़्तियारी की जब से वो हमारा हो गया इक अन-जानी ख़ुशी के आसरे में हमें हर ग़म गवारा हो गया है हमें कब रास आ सकती थी दुनिया ग़नीमत है गुज़ारा हो गया है जिन्हें रहता था ज़ो'म-ए-दिल-फ़रोशी उन्हें अब के ख़सारा हो गया है

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम

Jaun Elia

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस

Sandeep Thakur

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ये शो'ले आज़माना जानते हैं सो हम दामन बचाना जानते हैं तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं खनकती नुक़रई दिलकश हँसी में हम अपना ग़म छुपाना जानते हैं बुलाना ही नहीं पड़ता है 'अंबर' ये ग़म अपना ठिकाना जानते हैं

Ambreen Haseeb Ambar

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ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया

Ambreen Haseeb Ambar

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वो मसीहा न बना हम ने भी ख़्वाहिश नहीं की अपनी शर्तों पे जिए उस से गुज़ारिश नहीं की उस ने इक रोज़ किया हम से अचानक वो सवाल धड़कनें थम सी गईं वक़्त ने जुम्बिश नहीं की किस लिए बुझने लगे अव्वल-ए-शब सारे चराग़ आँधियों ने भी अगरचे कोई साज़िश नहीं की अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जवाब होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की उस ने ज़ाहिर न किया अपना पशेमाँ होना हम भी अंजान रहे हम ने भी पुर्सिश नहीं की

Ambreen Haseeb Ambar

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मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से जो मुझे भूल गया इस क़दर आसानी से ख़ुद से घबरा के यही कहती हूँ औरों की तरह ख़ौफ़ आता है मुझे शहर की वीरानी से अब किसी और सलीक़े से सताए दुनिया जी बदलने लगा असबाब-ए-परेशानी से तन को ढाँपे हुए फिरते हैं सभी लोग यहाँ शर्म आती है किसे सोच की उर्यानी से ऐ फ़लक छोड़ दे बेयार-ओ-मददगार हमें दम घुटा जाता है अब तेरी निगहबानी से मैं उसे ख़्वाब समझ सकती हूँ लेकिन 'अंबर' लम्स जाता नहीं उस का मिरी पेशानी से

Ambreen Haseeb Ambar

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ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना इश्क़ ने यूँँ दोनों को आमेज़ किया अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं आईने में तुम होते हो तुम भी ना बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना माँग रहे हो रुख़्सत और अब ख़ुद ही हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना

Ambreen Haseeb Ambar

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