ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना इश्क़ ने यूँँ दोनों को आमेज़ किया अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं आईने में तुम होते हो तुम भी ना बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना माँग रहे हो रुख़्सत और अब ख़ुद ही हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया
Ambreen Haseeb Ambar
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ये शो'ले आज़माना जानते हैं सो हम दामन बचाना जानते हैं तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं खनकती नुक़रई दिलकश हँसी में हम अपना ग़म छुपाना जानते हैं बुलाना ही नहीं पड़ता है 'अंबर' ये ग़म अपना ठिकाना जानते हैं
Ambreen Haseeb Ambar
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वो मसीहा न बना हम ने भी ख़्वाहिश नहीं की अपनी शर्तों पे जिए उस से गुज़ारिश नहीं की उस ने इक रोज़ किया हम से अचानक वो सवाल धड़कनें थम सी गईं वक़्त ने जुम्बिश नहीं की किस लिए बुझने लगे अव्वल-ए-शब सारे चराग़ आँधियों ने भी अगरचे कोई साज़िश नहीं की अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जवाब होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की उस ने ज़ाहिर न किया अपना पशेमाँ होना हम भी अंजान रहे हम ने भी पुर्सिश नहीं की
Ambreen Haseeb Ambar
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मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से जो मुझे भूल गया इस क़दर आसानी से ख़ुद से घबरा के यही कहती हूँ औरों की तरह ख़ौफ़ आता है मुझे शहर की वीरानी से अब किसी और सलीक़े से सताए दुनिया जी बदलने लगा असबाब-ए-परेशानी से तन को ढाँपे हुए फिरते हैं सभी लोग यहाँ शर्म आती है किसे सोच की उर्यानी से ऐ फ़लक छोड़ दे बेयार-ओ-मददगार हमें दम घुटा जाता है अब तेरी निगहबानी से मैं उसे ख़्वाब समझ सकती हूँ लेकिन 'अंबर' लम्स जाता नहीं उस का मिरी पेशानी से
Ambreen Haseeb Ambar
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तुम्हारा जो सहारा हो गया है भँवर भी अब किनारा हो गया है मोहब्बत में भला क्या और होता मिरा ये दिल तुम्हारा हो गया है तुम्हारी याद से है वो चराग़ाँ की आँसू भी सितारा हो गया है अजब है मौसम-ए-बे-इख़्तियारी की जब से वो हमारा हो गया इक अन-जानी ख़ुशी के आसरे में हमें हर ग़म गवारा हो गया है हमें कब रास आ सकती थी दुनिया ग़नीमत है गुज़ारा हो गया है जिन्हें रहता था ज़ो'म-ए-दिल-फ़रोशी उन्हें अब के ख़सारा हो गया है
Ambreen Haseeb Ambar
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