कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ मैं बिखर गया हूँ कहाँ कहाँ मुझे क्या हुआ किसे ढूँडता हूँ मैं अपने क़़ुर्ब-ओ-जवार में ऐ फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-दोस्ताँ मुझे क्या हुआ ये कहाँ पड़ा हूँ ज़मीं के गर्द-ओ-ग़ुबार में वो कहाँ गया मिरा आसमाँ मुझे क्या हुआ कोई रात थी कोई चाँद था कई लोग थे वो अजब समाँ था मगर वहाँ मुझे क्या हुआ मिरे रू-ब-रू मुझे मैं दिखाई नहीं दिया मिरे आईने मिरे राज़-दाँ मुझे क्या हुआ
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे ये मिरी आँख का आँसू ही सितारा है मुझे मैं किसी ध्यान में बैठा हूँ मुझे क्या मालूम एक आहट ने कई बार पुकारा है मुझे आँख से गर्द हटाता हूँ तो क्या देखता हूँ अपने बिखरे हुए मलबे का नज़ारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे
Faizi
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रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे ये मिरी आँख का आँसू ही सितारा है मुझे मैं किसी ध्यान में बैठा हूँ मुझे क्या मालूम एक आहट ने कई बार पुकारा है मुझे आँख से गर्द हटाता हूँ तो क्या देखता हूँ अपने बिखरे हुए मलबे का नज़ारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे
Faizi
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अच्छा है तू ने इन दिनों देखा नहीं मुझे दुनिया ने तेरे काम का छोड़ा नहीं मुझे हाँ ठीक है मैं भूला हुआ हूँ जहान को लेकिन ख़याल अपना भी होता नहीं मुझे अब अपने आँसुओं पे है सैराबी-ए-हयात कुछ और इस फ़लक पे भरोसा नहीं मुझे है मेहरबाँ कोई जो किए जा रहा है काम वर्ना मआश का तो सलीक़ा नहीं मुझे ऐ रह-गुज़ार-ए-सिलसिला-ए-इश्क़-ए-बे-लगाम जाना कहाँ है तू ने बताया नहीं मुझे है तो मिरा भी नाम सर-ए-फ़हरिस-ए-जुनूँ लेकिन अभी किसी ने पुकारा नहीं मुझे
Faizi
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