ghazalKuch Alfaaz

रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे  ये मिरी आँख का आँसू ही सितारा है मुझे  मैं किसी ध्यान में बैठा हूँ मुझे क्या मालूम  एक आहट ने कई बार पुकारा है मुझे  आँख से गर्द हटाता हूँ तो क्या देखता हूँ  अपने बिखरे हुए मलबे का नज़ारा है मुझे  ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल  तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे  मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ  तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे  तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र  तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे  मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में  लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे  जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में  मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे  ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल  तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे  मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ  तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे  तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र  तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे  मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में  लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे  जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में  मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

Umair Najmi

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ मैं बिखर गया हूँ कहाँ कहाँ मुझे क्या हुआ किसे ढूँडता हूँ मैं अपने क़़ुर्ब-ओ-जवार में ऐ फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-दोस्ताँ मुझे क्या हुआ ये कहाँ पड़ा हूँ ज़मीं के गर्द-ओ-ग़ुबार में वो कहाँ गया मिरा आसमाँ मुझे क्या हुआ कोई रात थी कोई चाँद था कई लोग थे वो अजब समाँ था मगर वहाँ मुझे क्या हुआ मिरे रू-ब-रू मुझे मैं दिखाई नहीं दिया मिरे आईने मिरे राज़-दाँ मुझे क्या हुआ

Faizi

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रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे ये मिरी आँख का आँसू ही सितारा है मुझे मैं किसी ध्यान में बैठा हूँ मुझे क्या मालूम एक आहट ने कई बार पुकारा है मुझे आँख से गर्द हटाता हूँ तो क्या देखता हूँ अपने बिखरे हुए मलबे का नज़ारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे

Faizi

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अच्छा है तू ने इन दिनों देखा नहीं मुझे दुनिया ने तेरे काम का छोड़ा नहीं मुझे हाँ ठीक है मैं भूला हुआ हूँ जहान को लेकिन ख़याल अपना भी होता नहीं मुझे अब अपने आँसुओं पे है सैराबी-ए-हयात कुछ और इस फ़लक पे भरोसा नहीं मुझे है मेहरबाँ कोई जो किए जा रहा है काम वर्ना मआश का तो सलीक़ा नहीं मुझे ऐ रह-गुज़ार-ए-सिलसिला-ए-इश्क़-ए-बे-लगाम जाना कहाँ है तू ने बताया नहीं मुझे है तो मिरा भी नाम सर-ए-फ़हरिस-ए-जुनूँ लेकिन अभी किसी ने पुकारा नहीं मुझे

Faizi

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