रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे ये मिरी आँख का आँसू ही सितारा है मुझे मैं किसी ध्यान में बैठा हूँ मुझे क्या मालूम एक आहट ने कई बार पुकारा है मुझे आँख से गर्द हटाता हूँ तो क्या देखता हूँ अपने बिखरे हुए मलबे का नज़ारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे ये मिरी आँख का आँसू ही सितारा है मुझे मैं किसी ध्यान में बैठा हूँ मुझे क्या मालूम एक आहट ने कई बार पुकारा है मुझे आँख से गर्द हटाता हूँ तो क्या देखता हूँ अपने बिखरे हुए मलबे का नज़ारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे ऐ मिरे लाडले ऐ नाज़ के पाले हुए दिल तू ने किस कू-ए-मलामत से गुज़ारा है मुझे मैं तो अब जैसे भी गुज़रेगी गुज़ारूँगा यहाँ तुम कहाँ जाओगे धड़का तो तुम्हारा है मुझे तू ने क्या खोल के रख दी है लपेटी हुई उम्र तू ने किन आख़िरी लम्हों में पुकारा है मुझे मैं कहाँ जाता था उस बज़्म-ए-नज़र-बाज़ाँ में लेकिन अब के तिरे अबरू का इशारा है मुझे जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में मेरी तन्हाई ने शीशे में उतारा है मुझे
Faizi
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कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ मैं बिखर गया हूँ कहाँ कहाँ मुझे क्या हुआ किसे ढूँडता हूँ मैं अपने क़़ुर्ब-ओ-जवार में ऐ फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-दोस्ताँ मुझे क्या हुआ ये कहाँ पड़ा हूँ ज़मीं के गर्द-ओ-ग़ुबार में वो कहाँ गया मिरा आसमाँ मुझे क्या हुआ कोई रात थी कोई चाँद था कई लोग थे वो अजब समाँ था मगर वहाँ मुझे क्या हुआ मिरे रू-ब-रू मुझे मैं दिखाई नहीं दिया मिरे आईने मिरे राज़-दाँ मुझे क्या हुआ
Faizi
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अच्छा है तू ने इन दिनों देखा नहीं मुझे दुनिया ने तेरे काम का छोड़ा नहीं मुझे हाँ ठीक है मैं भूला हुआ हूँ जहान को लेकिन ख़याल अपना भी होता नहीं मुझे अब अपने आँसुओं पे है सैराबी-ए-हयात कुछ और इस फ़लक पे भरोसा नहीं मुझे है मेहरबाँ कोई जो किए जा रहा है काम वर्ना मआश का तो सलीक़ा नहीं मुझे ऐ रह-गुज़ार-ए-सिलसिला-ए-इश्क़-ए-बे-लगाम जाना कहाँ है तू ने बताया नहीं मुझे है तो मिरा भी नाम सर-ए-फ़हरिस-ए-जुनूँ लेकिन अभी किसी ने पुकारा नहीं मुझे
Faizi
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