कुछ इस तरह से नज़र से गुज़र गया कोई कि दिल को ग़म का सज़ा-वार कर गया कोई दिल-ए-सितम-ज़दा को जैसे कुछ हुआ ही नहीं ख़ुद अपने हुस्न से यूँँ बे-ख़बर गया कोई वो एक जल्वा-ए-सद-रंग इक हुजूम-ए-बहार न जाने कौन था जाने किधर गया कोई नज़र कि तिश्ना-ए-दीदार थी रही महरूम नज़र उठाई तो दिल में उतर गया कोई निगाह-ए-शौक़ की महरूमियों से ना-वाक़िफ़ निगाह-ए-शौक़ पे इल्ज़ाम धर गया कोई अब उन के हुस्न में हुस्न-ए-नज़र भी शामिल है कुछ और मेरी नज़र से सँवर गया कोई किसी के पाँव की आहट कि दिल की धड़कन थी हज़ार बार उठा सू-ए-दर गया कोई नसीब-ए-अहल-ए-वफ़ा ये सुकून-ए-दिल तो न था ज़रूर नाला-ए-दिल बे-असर गया कोई उठा फिर आज मिरे दिल में रश्क का तूफ़ाँ फिर उन की राह से बा-चश्म-ए-तर गया कोई ये कह के याद करेंगे 'हफ़ीज़' दोस्त मुझे वफ़ा की रस्म को पाइंदा कर गया कोई
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोल कर देखा किए एक ही लम्हे में जैसे उम्र-भर देखा किए दिल अगर बेताब है दिल का मुक़द्दर है यही जिस क़दर थी हम को तौफ़ीक़-ए-नज़र देखा किए ख़ुद-फ़रोशाना अदा थी मेरी सूरत देखना अपने ही जल्वे ब-अंदाज़-ए-दिगर देखा किए ना-शनास-ए-ग़म फ़क़त दाद-ए-हुनर देते रहे हम मता-ए-ग़म को रुस्वा-ए-हुनर देखा किए देखने का अब ये आलम है कोई हो या न हो हम जिधर देखा किए पहरों उधर देखा किए हुस्न को देखा है मैं ने हुस्न की ख़ातिर 'हफ़ीज़' वर्ना सब अपना ही मेयार-ए-नज़र देखा किए
Hafeez Hoshiarpuri
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तमाम उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया इस इंतिज़ार में किस किस से प्यार हम ने किया तलाश-ए-दोस्त को इक उम्र चाहिए ऐ दोस्त कि एक उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया तेरे ख़याल में दिल शादमाँ रहा बरसों तिरे हुज़ूर उसे सोगवार हम ने किया ये तिश्नगी है के उन से क़रीब रह कर भी 'हफ़ीज़' याद उन्हें बार बार हम ने किया
Hafeez Hoshiarpuri
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रौशनी सी कभी कभी दिल में मंज़िल-ए-बे-निशाँ से आती है लौट कर नूर की किरन जैसे सफ़र-ए-ला-मकाँ से आती है नौ-ए-इंसाँ है गोश-बर-आवाज़ क्या ख़बर किस जहाँ से आती है अपनी फ़रियाद बाज़गश्त न हो इक सदा आसमाँ से आती है तख़्ता-ए-दार है कि तख़्ता-ए-गुल बू-ए-ख़ूँ गुलिस्ताँ से आती है दिल से आती है बात लब पे 'हफ़ीज़' बात दिल में कहाँ से आती है
Hafeez Hoshiarpuri
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नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का अरबाब-ए-गुलिस्ताँ पे नहीं कम-नज़री का तौफ़ीक़-ए-रिफ़ाक़त नहीं उन को सर-ए-मंज़िल रस्ते में जिन्हें पास रहा हम-सफ़री का अब ख़ानका ओ मदरसा ओ मय-कदा हैं एक इक सिलसिला है क़ाफ़िला-ए-बे-ख़बरी का हर नक़्श है आईना-ए-नैरंग-ए-तमाशा दुनिया है कि हासिल मिरी हैराँ-नज़री का अब फ़र्श से ता-अर्श ज़बूँ-हाल है फ़ितरत इक म'अरका दर-पेश है अज़्म-ए-बशरी का कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का बे-वासता-ए-इश्क़ भी रंग-ए-रुख़-ए-परवेज़ उनवान है फ़रहाद की ख़ूनीं-जिगरी का आख़िर तिरे दर पे मुझे ले आई मोहब्बत देखा न गया हाल मिरी दर-बदरी का दिल में हो फ़क़त तुम ही तुम आँखों पे न जाओ आँखों को तो है रोग परेशाँ-नज़री का बे-पैरवी-ए-'मीर' 'हफ़ीज़' अपनी रविश है हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कम-हुनरी का
Hafeez Hoshiarpuri
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लफ़्ज़ अभी ईजाद होंगे हर ज़रूरत के लिए शरह-ए-राहत के लिए ग़म की सराहत के लिए अब मिरा चुप-चाप रहना अम्र-ए-मजबूरी सही मैं ने खोली ही ज़बाँ कब थी शिकायत के लिए मेरे चश्म-ओ-गोश-ओ-लब से पूछ लो सब कुछ यहीं मुझ को मेरे सामने लाओ शहादत के लिए सख़्त-कोशी सख़्त-जानी की तरफ़ लाई मुझे मुझ को ये फ़ुर्सत ग़नीमत है अलालत के लिए ऑक्सीजन से शबिस्तान-ए-अनासिर ताबनाक मुज़्तरिब हर ज़ी-नफ़स उस की रिफ़ाक़त के लिए मर गए कुछ लोग जीने का मुदावा सोच कर और कुछ जीते रहे जीने की आदत के लिए आह मर्ग-ए-आदमी पर आदमी रोए बहुत कोई भी रोया न मर्ग-ए-आदमियत के लिए कोई मौक़ा ज़िंदगी का आख़िरी मौक़ा नहीं इस क़दर ताजील क्यूँ रफ़-ए-कुदूरत के लिए इस्तक़ामत ऐ मिरे दैर-आश्ना-ए-ग़म-गुसार एक आँसू है बहुत हुस्न-ए-नदामत के लिए कोई 'नासिर' की ग़ज़ल कोई ज़फ़र की मय-तरंग चाहिए कुछ तो मिरी शाम-ए-अयादत के लिए गुलशन-आबाद-ए-जहाँ में सूरत-ए-शबनम 'हफ़ीज़' हम अगर रोए भी तो रोने की फ़ुर्सत के लिए
Hafeez Hoshiarpuri
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