kunj kunj naghhma-zan basant aa gai ab sajegi anjuman basant aa gai ud rahe hain shahr men patang rang rang jagmaga utha gagan basant aa gai mohne lubhane vaale pyare pyare log dekhna chaman chaman basant aa gai sabz ketiyon pe phir nikhar aa gaya le ke zard pairahan basant aa gai pichhle saal ke malal dil se mit gae le ke phir nai chubhan basant aa gai kunj kunj naghma-zan basant aa gai ab sajegi anjuman basant aa gai ud rahe hain shahr mein patang rang rang jagmaga utha gagan basant aa gai mohne lubhane wale pyare pyare log dekhna chaman chaman basant aa gai sabz ketiyon pe phir nikhaar aa gaya le ke zard pairahan basant aa gai pichhle sal ke malal dil se mit gae le ke phir nai chubhan basant aa gai
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बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है
Mehshar Afridi
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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम
Ahmad Faraz
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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो
Umair Najmi
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क्या ख़बर उस रौशनी में और क्या रौशन हुआ जब वो इन हाथों से पहली मर्तबा रौशन हुआ वो मेरे सीने से लग कर जिस को रोई कौन था किस के बुझने पे मैं आज उस की जगह रौशन हुआ वैसे मैं इन रास्तों और ताख़चों का था नहीं फिर भी तू ने जिस जगह पर रख दिया रौशन हुआ मेरे जाने पर सभी रोए बहुत रोए मगर इक दिया मेरी तवक़्क़ो से सिवा रौशन हुआ तेरे अपने तेरी किरनों को तरसते है यहाँ तू ये किन गलियों में किन लोगों में जा रौशन हुआ मैं ने पूछा था कि मुझ जैसा भी कोई और है दूर जंगल में कहीं इक मकबरा रौशन हुआ जाने कैसी आग में वो जल रहा है इन दिनों उस ने मुँह पोंछा तो मेरा तौलिया रौशन हुआ कोई उस की रौशनी के शर से कब महफ़ूज़ है मेरी आँखें बुझ गई और कोयला रौशन हुआ
Tehzeeb Hafi
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सारा सामान लिए घर से निकल आई है फ़ोन पर फ़ोन लगाती हुई तन्हाई है याद आने लगे हैं लोग मुझे गुज़रे हुए दोस्त क्या तू ने मेरी झूठी क़सम खाई है अपनी दुनिया में मगन रहना इसे कहते हैं इक पलस्तर झड़ी दीवार पे जो काई है बात जो दिल पे लगी है वो कोई बात नहीं सर के ऊपर से गई बात में गहराई है उस के पहलू में भला सोचता हूँ क्या क्या मैं ख़्वाब में आ गया हूँ नींद नहीं आई है
Rishabh Sharma
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दिल में और तो क्या रक्खा है तेरा दर्द छुपा रक्खा है इतने दुखों की तेज़ हवा में दिल का दीप जला रक्खा है धूप से चेहरों ने दुनिया में क्या अंधेर मचा रक्खा है इस नगरी के कुछ लोगों ने दुख का नाम दवा रक्खा है वादा-ए-यार की बात न छेड़ो ये धोका भी खा रक्खा है भूल भी जाओ बीती बातें इन बातों में क्या रक्खा है चुप चुप क्यूँँ रहते हो 'नासिर' ये क्या रोग लगा रक्खा है
Nasir Kazmi
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जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है
Nasir Kazmi
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शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ यूँँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ उन उजालों की धुन में फिरता हूँ छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ रैन अँधेरी है और किनारा दूर चाँद निकले तो पार उतर जाएँ
Nasir Kazmi
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गली गली मिरी याद बिछी है प्यारे रस्ता देख के चल मुझ से इतनी वहशत है तो मेरी हदों से दूर निकल एक समय तिरा फूल सा नाज़ुक हाथ था मेरे शानों पर एक ये वक़्त कि मैं तन्हा और दुख के काँटों का जंगल याद है अब तक तुझ से बिछड़ने की वो अँधेरी शाम मुझे तू ख़ामोश खड़ा था लेकिन बातें करता था काजल मैं तो एक नई दुनिया की धुन में भटकता फिरता हूँ मेरी तुझ से कैसे निभेगी एक हैं तेरे फ़िक्र ओ अमल मेरा मुँह क्या देख रहा है देख इस काली रात को देख मैं वही तेरा हमराही हूँ साथ मिरे चलना हो तो चल
Nasir Kazmi
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'नासिर' क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जाएगा लहू नाम-ए-ख़ुदा हो जवान अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है
Nasir Kazmi
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