ghazalKuch Alfaaz

सारा सामान लिए घर से निकल आई है फ़ोन पर फ़ोन लगाती हुई तन्हाई है याद आने लगे हैं लोग मुझे गुज़रे हुए दोस्त क्या तू ने मेरी झूठी क़सम खाई है अपनी दुनिया में मगन रहना इसे कहते हैं इक पलस्तर झड़ी दीवार पे जो काई है बात जो दिल पे लगी है वो कोई बात नहीं सर के ऊपर से गई बात में गहराई है उस के पहलू में भला सोचता हूँ क्या क्या मैं ख़्वाब में आ गया हूँ नींद नहीं आई है

Related Ghazal

मुझ ऐसे शख़्स से रिश्ता नहीं निकाल सका वो अपने हुस्न का सदक़ा नहीं निकाल सका मैं मिल रहा था उसे बा'द एक मुद्दत के सो उस सेे कोई भी रिश्ता नहीं निकाल सका तेरे लिए तो मुझे ज़िंदगी भी कम थी मगर मेरे लिए तो तू लम्हा नहीं निकाल सका तू देख पाई नहीं मुझ को ख़त्म होते हुए मैं तेरी आँख का कचरा नहीं निकाल सका इक ऐसी बात का ग़ुस्सा है मेरे लहजे में वो बात जिस का मैं ग़ुस्सा नहीं निकाल सका

Vikram Gaur Vairagi

33 likes

क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

105 likes

सारे का सारा तो मेरा भी नहीं और वो शख़्स बे-वफ़ा भी नहीं ग़ौर से देखने पे बोली है शादी से पहले सोचना भी नहीं अच्छी सेहत का है मेरा महबूब धोखे देते हुए थका भी नहीं जितना बर्बाद कर दिया तू ने उतना आबाद तो मैं था भी नहीं मुझ को बस इतना दीन आता है जहाँ मैं ख़ुद नहीं ख़ुदा भी नहीं

Kushal Dauneria

43 likes

हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया

Mehshar Afridi

53 likes

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

315 likes

More from Rishabh Sharma

उदास लड़कियों से राब्ता निभाता हूँ मैं एक फूल हूँ जो तितलियाँ बचाता हूँ जी मैं ही इश्क़ में हारे हुओं का मुर्शिद हूँ जी मैं ही हर सदी में क़ैस बन के आता हूँ सताई होती हैं जो आप के समुंदर की मैं ऐसी मछलियों के साथ गोते खाता हूँ किसी के वास्ते काँटे नहीं बिछाता मैं मगर यूँँ भी नहीं के काँटों को हटाता हूँ मैं मौसमी हँसी का मारा हूँ कि कोई दिन मैं साल भर में कोई दिन ही मुस्कुराता हूँ बदन भी आते हैं और हिचकियाँ भी आती हैं मैं जिन को भूल गया उन को याद आता हूँ निभाने जैसा तो कुछ भी नहीं है उस में मगर वो मर न जाए कहीं इस लिए निभाता हूँ

Rishabh Sharma

19 likes

जो कि होते हुए आज़ार बहुत होता है बा'द होने के मज़ेदार बहुत होता है दिन बदलने के लिए ख़ुद-कुशी करने के लिए एक ही शख़्स का इनकार बहुत होता है भागने वाले को दुनिया भी बहुत छोटी है घूमने वाले को बाज़ार बहुत होता है जिस ने भेजा है तुम्हें जा के उसे कहना तुम लाख प्यादों में भी सालार बहुत होता है जंग हर चीज़ को हथियार बना देती है बच्चे के हाथ में परकार बहुत होता है छत से छत वालों में दीवार खड़ी करने को उन के बच्चों में हुआ प्यार बहुत होता है

Rishabh Sharma

18 likes

डोली उठा के ले गए महलों के बादशाह सड़कों से देखते रहे सड़कों के बादशाह उम्मीद की किरण में हर इक खेत जल गए सलफ़ास खा के मर गए खेतों के बादशाह मैं दूसरी ग़ज़ल की तरफ़ चल दिया तो दोस्त पिछली बुलाती रह गई ग़ज़लों के बादशाह आँखों की तख़्त-पोशी तो बीनाई ले गई आँसू बनेंगे देखियो पलकों के बादशाह

Rishabh Sharma

15 likes

क्या दोस्त मुहब्बत का नियम कुछ नहीं होता खा लेते हैं सब झूठी क़सम कुछ नहीं होता वो पर्दा नशीं पूछती रहती है मुझे रोज़ क्या वाकई में अगला जनम कुछ नहीं होता परवत के मुहाने पे खड़ा सोच रहा हूँ किस ने कहा था एक क़दम कुछ नहीं होता और वाक़्या मशहूर था जिस पेड़ को ले कर उस पेड़ पे लिक्खा था भरम कुछ नहीं होता वो रौशनी के दिन थे ऋषभ शर्मा तेरे साथ जब तू हमें समझाता था ग़म कुछ नहीं होता

Rishabh Sharma

18 likes

पानी की चोट चोट है कच्चे घड़ों से पूछ कम उम्र में बियाही गई लड़कियों से पूछ किस किस से तेरे बारे में पूछा नहीं बता जा डाकियों से पूछ जा कंडक्टरों से पूछ ये हिज्र कैसे काटता है आदमी की उम्र नदियों से कटने वाले बड़े पर्वतों से पूछ कैसे जुदा किया है उसे कैसे ख़ुश रहें बरसे बग़ैर जाते हुए बादलों से पूछ

Rishabh Sharma

21 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Rishabh Sharma.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Rishabh Sharma's ghazal.