जो कि होते हुए आज़ार बहुत होता है बा'द होने के मज़ेदार बहुत होता है दिन बदलने के लिए ख़ुद-कुशी करने के लिए एक ही शख़्स का इनकार बहुत होता है भागने वाले को दुनिया भी बहुत छोटी है घूमने वाले को बाज़ार बहुत होता है जिस ने भेजा है तुम्हें जा के उसे कहना तुम लाख प्यादों में भी सालार बहुत होता है जंग हर चीज़ को हथियार बना देती है बच्चे के हाथ में परकार बहुत होता है छत से छत वालों में दीवार खड़ी करने को उन के बच्चों में हुआ प्यार बहुत होता है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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सारा सामान लिए घर से निकल आई है फ़ोन पर फ़ोन लगाती हुई तन्हाई है याद आने लगे हैं लोग मुझे गुज़रे हुए दोस्त क्या तू ने मेरी झूठी क़सम खाई है अपनी दुनिया में मगन रहना इसे कहते हैं इक पलस्तर झड़ी दीवार पे जो काई है बात जो दिल पे लगी है वो कोई बात नहीं सर के ऊपर से गई बात में गहराई है उस के पहलू में भला सोचता हूँ क्या क्या मैं ख़्वाब में आ गया हूँ नींद नहीं आई है
Rishabh Sharma
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उदास लड़कियों से राब्ता निभाता हूँ मैं एक फूल हूँ जो तितलियाँ बचाता हूँ जी मैं ही इश्क़ में हारे हुओं का मुर्शिद हूँ जी मैं ही हर सदी में क़ैस बन के आता हूँ सताई होती हैं जो आप के समुंदर की मैं ऐसी मछलियों के साथ गोते खाता हूँ किसी के वास्ते काँटे नहीं बिछाता मैं मगर यूँँ भी नहीं के काँटों को हटाता हूँ मैं मौसमी हँसी का मारा हूँ कि कोई दिन मैं साल भर में कोई दिन ही मुस्कुराता हूँ बदन भी आते हैं और हिचकियाँ भी आती हैं मैं जिन को भूल गया उन को याद आता हूँ निभाने जैसा तो कुछ भी नहीं है उस में मगर वो मर न जाए कहीं इस लिए निभाता हूँ
Rishabh Sharma
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किसी के साथ हूँ पर हूँ किसी की आँखों में मैं धूल झोंकता हूँ ज़िंदगी की आँखों में बिछड़ के मुझ सेे वो ख़ुद को तलाश करने लगी तलाश भी किसी और आदमी की आँखों में खुले गगन के तले नाचने का मन है बस किसी का ख़्वाब नहीं मोरनी की आँखों में
Rishabh Sharma
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क्या दोस्त मुहब्बत का नियम कुछ नहीं होता खा लेते हैं सब झूठी क़सम कुछ नहीं होता वो पर्दा नशीं पूछती रहती है मुझे रोज़ क्या वाकई में अगला जनम कुछ नहीं होता परवत के मुहाने पे खड़ा सोच रहा हूँ किस ने कहा था एक क़दम कुछ नहीं होता और वाक़्या मशहूर था जिस पेड़ को ले कर उस पेड़ पे लिक्खा था भरम कुछ नहीं होता वो रौशनी के दिन थे ऋषभ शर्मा तेरे साथ जब तू हमें समझाता था ग़म कुछ नहीं होता
Rishabh Sharma
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पानी की चोट चोट है कच्चे घड़ों से पूछ कम उम्र में बियाही गई लड़कियों से पूछ किस किस से तेरे बारे में पूछा नहीं बता जा डाकियों से पूछ जा कंडक्टरों से पूछ ये हिज्र कैसे काटता है आदमी की उम्र नदियों से कटने वाले बड़े पर्वतों से पूछ कैसे जुदा किया है उसे कैसे ख़ुश रहें बरसे बग़ैर जाते हुए बादलों से पूछ
Rishabh Sharma
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