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उदास लड़कियों से राब्ता निभाता हूँ मैं एक फूल हूँ जो तितलियाँ बचाता हूँ जी मैं ही इश्क़ में हारे हुओं का मुर्शिद हूँ जी मैं ही हर सदी में क़ैस बन के आता हूँ सताई होती हैं जो आप के समुंदर की मैं ऐसी मछलियों के साथ गोते खाता हूँ किसी के वास्ते काँटे नहीं बिछाता मैं मगर यूँँ भी नहीं के काँटों को हटाता हूँ मैं मौसमी हँसी का मारा हूँ कि कोई दिन मैं साल भर में कोई दिन ही मुस्कुराता हूँ बदन भी आते हैं और हिचकियाँ भी आती हैं मैं जिन को भूल गया उन को याद आता हूँ निभाने जैसा तो कुछ भी नहीं है उस में मगर वो मर न जाए कहीं इस लिए निभाता हूँ

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा

Tehzeeb Hafi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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सारा सामान लिए घर से निकल आई है फ़ोन पर फ़ोन लगाती हुई तन्हाई है याद आने लगे हैं लोग मुझे गुज़रे हुए दोस्त क्या तू ने मेरी झूठी क़सम खाई है अपनी दुनिया में मगन रहना इसे कहते हैं इक पलस्तर झड़ी दीवार पे जो काई है बात जो दिल पे लगी है वो कोई बात नहीं सर के ऊपर से गई बात में गहराई है उस के पहलू में भला सोचता हूँ क्या क्या मैं ख़्वाब में आ गया हूँ नींद नहीं आई है

Rishabh Sharma

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जो कि होते हुए आज़ार बहुत होता है बा'द होने के मज़ेदार बहुत होता है दिन बदलने के लिए ख़ुद-कुशी करने के लिए एक ही शख़्स का इनकार बहुत होता है भागने वाले को दुनिया भी बहुत छोटी है घूमने वाले को बाज़ार बहुत होता है जिस ने भेजा है तुम्हें जा के उसे कहना तुम लाख प्यादों में भी सालार बहुत होता है जंग हर चीज़ को हथियार बना देती है बच्चे के हाथ में परकार बहुत होता है छत से छत वालों में दीवार खड़ी करने को उन के बच्चों में हुआ प्यार बहुत होता है

Rishabh Sharma

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डोली उठा के ले गए महलों के बादशाह सड़कों से देखते रहे सड़कों के बादशाह उम्मीद की किरण में हर इक खेत जल गए सलफ़ास खा के मर गए खेतों के बादशाह मैं दूसरी ग़ज़ल की तरफ़ चल दिया तो दोस्त पिछली बुलाती रह गई ग़ज़लों के बादशाह आँखों की तख़्त-पोशी तो बीनाई ले गई आँसू बनेंगे देखियो पलकों के बादशाह

Rishabh Sharma

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पराए शहर में इक दोस्त की जगह थी वो कि सुख में जिस्म थी और दुख में मसखरा थी वो वो लड़-झगड़ के मेरे पास लौट आती थी पहाड़ों पर से कोई दी हुई सदा थी वो शरीफ़ लड़कियों के दिल जो मैं ने तोड़े थे उन्हीं की भेजी हुई एक बद-दुआ थी वो

Rishabh Sharma

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क्या दोस्त मुहब्बत का नियम कुछ नहीं होता खा लेते हैं सब झूठी क़सम कुछ नहीं होता वो पर्दा नशीं पूछती रहती है मुझे रोज़ क्या वाकई में अगला जनम कुछ नहीं होता परवत के मुहाने पे खड़ा सोच रहा हूँ किस ने कहा था एक क़दम कुछ नहीं होता और वाक़्या मशहूर था जिस पेड़ को ले कर उस पेड़ पे लिक्खा था भरम कुछ नहीं होता वो रौशनी के दिन थे ऋषभ शर्मा तेरे साथ जब तू हमें समझाता था ग़म कुछ नहीं होता

Rishabh Sharma

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